सुदामा चरित्र (By : Dr. Keshav Prathamvir)
हमारी सामाजिक व्यवस्था में ‘मित्र भाव’ का भी अनन्य महत्त्व है | हमारे ‘रामायण’, ‘महाभारत’ तथा श्रीमद् भागवत जैसे महाकाव्यों में आदर्श मित्रता के संबंध में, हम “सुग्रीब और राम” की मित्रता तथा “कृष्ण और सुदामा” की मित्रता के किस्से सुनते आए हैं | महाकवि तुलसीदास कहते हैं- “लेत-देत मन शंक न धरईं| बल अनुमान सदा हित करईं| बिपति काल कर सतगुन नेहा| श्रुति कह संत मित्र गुण एहा|” अनेक हिन्दी कवियों ने भी कृष्ण-सुदामा की मित्रता को अपने काव्य का विषय बनाया है| किन्तु कविवर नरोत्तमदास द्वारा रचित “सुदामाचरित” ने जो लोकप्रियता प्राप्त की है, वह किसी अन्य कवि को प्राप्त नहीं हुई| हिन्दी के जिन कवियों ने बहुत कम लिख कर अपार ख्याति प्राप्त की, उन थोड़े से साहित्यकारों में नरोत्तमदास जी का नाम भी, आदर के साथ स्मरण किया जाता है| इस कृति को या इसके किसी अनुभाग को अनेक प्रान्तों के शिक्षा संगठन, अपने पाठ्यक्रमों में समाहित करते रहे हैं | यहाँ इस काव्य की कुछ कथागत विशेषताओं पर संक्षिप्त में प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है|
श्री
कृष्ण और सुदामा की मित्रता का वर्णन ‘श्रीमद् भागवत के दसम स्कंध’ में
किया गया है | सान्दीपन गुरु के आश्रम में रह कर कृष्ण-सुदामा दोनों ही पढ़ते थे और दोनों
में प्रगाढ़ मित्रता भी थी| बड़े हो जाने पर श्री कृष्ण तो द्वारकाधीश अर्थात ‘द्वारिका’
के राजा हो जाते हैं | किन्तु सुदामा एक
दुर्बल, दीन, निर्धन ब्राह्मण के रूप में,
अपनी पत्नी ‘सुशीला’ उर्फ़ ‘सुबुद्धि’ के
साथ भिक्षावृति से अपना जीवन यापन करते हैं|
एक दिन सहज, यों ही बातचीत करते समय सुदामा ने अपनी पत्नी से अपने बालसखा श्रीकृष्ण
की मित्रता का उल्लेख कर दिया “कह्यो
सुदामा एक दिन कृष्ण हमारे मित्र| करत रहे
उपदेश प्रिय ऐसे परम विचित्र||” कृष्ण-सुदामा के बचपन की मित्रता का प्रसंग सुन कर वह बहुत प्रसन्न हुई और
बार-बार द्वारिका जा कर, कृष्ण से मिल आने का आग्रह करने लगी| “द्वारिका गए तें हरि,
दारिद हरेंगे पिय, द्वारिका के नाथ वे अनाथन के नाथ हैं|” पत्नी का यह उपदेश सुदामा को अच्छा नहीं लगता| वह पत्नी को उत्तर
देते हैं कि, “मैं दुनिया भर के लोगों को उपदेश देताहूँ-शिक्षा देता हूँ| अब तू
मुझे ही उपदेश देने लगी है| ब्राह्मण का
कर्म-धर्म तो शिक्षा देना है और भिक्षावृति से ही अपना जीवन यापन करना होता है|
“कै पढ़ीबो कै पढ़ायबो है, ब्राहम्न कौ धन केवल भिक्षा|” इस बात पर उसकी पत्नी
ने अपनी दरिद्रता का वर्णन करते हुए तर्क दिया, कि यदि मैं यह नहीं जान पाती कि
द्वारिकधीश आपके हितैषी-मित्र हैं, तो सारी दरिद्रता को सहन कर लेती और आपको
द्वारका जाने का हट नहीं करती- “जौ जानति न हितू हरि सौ, तौ काहे को द्वारका
पेलि पठौती| या घर ते न गयौ कबहूँ, पिय, फूटो तबा अरु टूटी कठौती|” सुदामा
भाग्य वादी हैं | वह पत्नी के तर्क को यह कह कर टालना चाहते हैं कि यदि भाग्य में
दरिद्रता ही लिखी है, तो उसे कौन टाल सकता है? “ “पैहै कहाँ ते अटारी अटा जिनके
विधि लिखी टूटी सी छानी| जो पै दरिद्र ललाट लिख्यो तौ काहू पै मेटि न जात अजानी||”
किन्तु सुबुद्धि तो ठहरी प्रयत्नवादी, वह हार मानाने वाली नहीं है| वह पुन: पुन:
अपनी गरीबी और दीन-हीन दशा का उल्लेख करते हुए, सुदामा को द्वारका जाने को प्रेरित
करती है-
“कोदों सवां जुरतो भरि पेट, तौ चाहति ना दधि दूध
मठौती|
सीत व्यतीत भये सिसियात, तौ हौं
हटती पै तुम्हें न हटौती|
जौ जानति न हितू हरी सौ, तौ काहे
कूँ द्वारका पेली पठौती|
या घर ते न गयो कबहूँ, पिय
टूटो तबा औ फूटी कठौती||”
वह
यह भी तर्क देती है कि जब हम जीवन भर दरिद्रता में ही बिता देंगे, तो उस
कृपानिधान-करूणासागर की मित्रता क्या लाभ है? “जौ पै सब जनम दरिद्र ही सतायो तौ
पै, कौन काम आइहै कृपानिधि की मित्रई|
सुदामा
फिर लोकनीति समझते हुए तर्क देते हैं कि सुख-दुःख सहन करते हुए बुरे दिन काट लेना
चाहिए| किन्तु विपत्ति या मुसीवत के समय मित्र के द्वार पर नहीं जाना उचित नहीं
है|- “सुख-दुःख करि दिन काटे ही बनेंगे भूलि, बिपति के परे पै, द्वार मित्र के
न जाइए|” वह यह भी तर्क देते हैं कि सारा जीवन तो इसी तरह दरिद्रता में ही बीत
गया, अब इस बुढापे में किसी का कनावड़ो अर्थात अहसानमंद क्यों बनूँ? इस पर सुबुद्धि
समझाती है कि आखिर तो आप प्रतिदिन द्वार-द्वार पर जा कर भिक्षा मागते हैं, इससे तो
अच्छा है कि एक बार द्वारकानाथ के द्वार पर ही चले जाइए| कवि के शब्दों में –
“हूजै कनावड़ो बार हजार
हितू जो पी दीनदयाल सौ पाइए |
तीनहुं लोक के ठाकुर हैं
तिन के दरवार न जात लजाइए|
मेरी कही मन में धरिए पिय भूलि
न और प्रसंग चलाइए|
और के द्वार सौ काज कहा
पिय, द्वारका नाथ के द्वार को जाइए||
पत्नी
के आग्रह के सामने सुदामा अपना झंडा डाला देते हैं और अंतिम तर्क देते हुए कहते हैं
कि तुमने तो आठों पहर द्वारका जाने की रट
लगा रखी है| किन्तु यह क्यों भूल जाती हो कि मित्रता में बराबरी का व्यवहार करना
होता है, “मित्र के गए तें चित होत है परस्पर, मित्र के जौ जेंइए तौ आपुहू
जिमाइए|” किन्तु यहाँ तो उनके पास ले जाने लिए हमारे घर में चार चावल तक नहीं
है| बस फिर क्या था |
“यह सुनिकें तीय हर्ष सौं, गई परौसिन पास|
पाँव सेर चावल लिए , आई सहित
हुलास ||
अब सुदामा को जाना ही पडा-
सिद्ध सदन गणपति सुमिर, बाँध दुपटिया
खूँट| मांगत खात चले गए, मारग बाली बूट|
तीन
दिवस चलि विप्र के, दूखि उठे जब पांय| एक ठौर सोए कहूँ, घास-पयार बिछाय||
अंतरयामी
भगवान ने अपने भगत पर कृपा की | जब सुदामा की नींद खुली तो देखा कि वे गोमती नदी के
किनारे वसे द्वारकापुरी में कृष्ण के दरवाजे पर ही खड़े हैं| वहां के सोने-चांदी के
महलों को देख कर सुदामा भौंचक्का से रह जाते हैं | वहाँ जो सुरक्षा कर्मचारी तैनात हैं, वे सतर्क मौन
धारण कर खड़े हैं और बिना पूछे कोई किसी से बात नहीं करते हैं | कवि लिखते हैं-
“दीठि चकि चौंधि गई, देखत सुवर्ण मई, एक ते
सरस एक द्वारिका के भौंन हैं|
पूछे बिन कौउ काहूसौं करें न बात,
देवता से ठाड़े सब ठाड़े सब साधि-साधि मौन हैं|
देखत सुदामें धाय पुरजन गहे पाँय, कृपा करि
कहु विप्र, कहाँ कीनो गौन हैं|
‘धीरज अधीर के ,हरन पर पीर के, बताओ बलवीर
के भौन यहाँ कौन हैं|”
द्वारपाल
ने जब यह सुना तो वह तुरंत भगवान कृष्ण के पास चला गया –“द्वारपाल चलि तहाँ गयौ, जहाँ कृष्ण जदुराय|
हाथ जोरि ठाढौ भयो, बोल्यो शीश नवाय|” फिर उसने सुदामा की दीन-हीन दशा का
निम्नांकित रूप में प्रभावशाली वर्णन
किया-
“सीस पगा न झगा तन पै, प्रभु जाने को आहि, बसे
केहि गामा|
धोती फटीसी लटी दुपटी, अरु पाँय उपानहूँ की नहीं सामा|
द्वार खड़ो द्विज दुर्लभ देह ,रह्यो चकि
सौ बसुधा अभिरामा|
पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत
आपनो नाम सुदामा||”
‘सुदामा’
नाम सुनते ही कृष्ण ने तत्काल अपने सारे
राज-काज छोड़ दिए और वहीं से हाथ जोड़कर दौड़ पड़े| उन्होंने बड़ी त्वरा में सुदामा के
पैर छुए, और उनके शरीर से लिपट गए| अपनी सजल आँखों से कुशल मंगल पूछी और उन्हें
अपने अंक में भर कर, अंत:पुर में ले गए| कवि के शब्दों में-
“बोल्यो द्वारपालक ‘सुदामा’ नाम पांडे
सुनि, छांडे राज-काज ऐसे जी की गति जाने को|
द्वारका के नाथ
हाथ जोरि धाये, गहे पांय, भेंटे
लपटाय ऐसे दुःख माने
को|
नैन
दोउ नीर, भरि पूछत कुशल हरी, विप्र
बोल्यो बिपदा में मोहि पहिचान्यों
को?
जैसी
तुम करी तैसी करे को कृपा के सिन्धु,
ऎसी प्रीति दीनबंधु ! दीनन सौं माने को||”
नाम
सुनते ही कृष्ण का हाथ जोड़ कर दौड़ना, पैर छू कर, सुदामा से लिपट जाना, और आँखों
में आंसुओं का आ जाना आदि क्रिया-कलाप सुदामा के प्रति, कृष्ण के आंतरिक प्रेम का
संकेत देते हैं|, वे उन्हें अंत:पुर में ले जाते हैं, ऊंचे आसन पर बिठाते हैं और
पानी मंगा कर अपने हाथों से सुदामा के पैर धोने लगते हैं | यह दृश्य देखने कृष्ण
की सभी रानियाँ और सेवक वहाँ खड़े हैं| किन्तु कृष्ण को कोई संकोच नहीं है| सुदामा
की दीन-हींन दशा को देख कर कृष्ण की आँखों से आंसुओं की ऎसी अविरल धरा निकली कि
उन्हीं से पैर धुल जाते हैं| पानी की आवश्यकता ही नहीं हुई| कवि ने इस प्रसंग का
बड़ा हृदयग्राही वर्णन निम्नांकित सवैया छंद में किया है-
“ऐसे बिहाल बिवाइन सों, पग कंटक
जाल लगे पुनि जोए|
हाय महादुख पायो सखा ! तुम आए इतै
न कितै दिन खोए|
देखि सुदामा की दीन दशा, करूणा
करिकें करूणानिधि रोए|
पानी परात कौ हाथ छुओ नहीं ,नैनन के जल सौं पग
धोए||”
इस
प्रकार श्री कृष्ण ने अपने बाल सखा सुदामा का बड़ी गर्म जोशी के साथ स्वागत किया| थोड़ा
मजाक भी किया गया| सुदामा की पत्नी ने, श्री कृष्ण को भेंट कराने के लिए, किसी
पडौसिन से पावसेर चावल उधार लेकर सुदामा को दिए थे| किन्तु सुदामा ने संकोचबस चावल
की पोटली को अपनी काँख में ही छिपा रखा| कृष्ण ठहरे अन्तर्यामी | वे सब कुछ जानते
थे| बोले, “कछु भाभी हमकों दियौ, सो तुम काहे न देत| चांपि पोटरी काँख में, रहे
कहौ केहि हेत?” श्री कृष्ण ने वनोद करते हुए सुदामा को यह भी
याद दिलाया कि पहले भी तुमने हम से चोरी की थी| गुरुमाई ने तुम्हें चने दिए थे, हम
दोनों के लिए | किन्तु तुमने चुपचाप ही छिप कर अकेले ही खा लिए थे| और इसलिए ही
तुम दरिद्री बन गए हैं क्योंकि नीतिशास्त्र में कहा गया है- “गुरुसौं कपट मित्र सौं चोरी|
कै होय निर्धन, कै होय कोड़ी |” और अब श्री कृष्ण ने जबरदस्ती सुदामा की काँख में से
चावल की पोटली छीन ली और खाने लगे | यह देख केर सभी अवाक रह गए| यह विशुद्ध
प्रेम-प्रीति की रीति ही ऎसी है| कवि का कथन है-
ब्राह्मण एक कौउ दुखिया,
सेर पाऊक चाउर लायो समा के |
प्रीति की रीति कहा कहिए,
तेहि बैठि चबावत कन्त रमा के ||
लक्ष्मीकान्त
भगवान
एक गरीब ब्राम्हण के लाए हुए पावभर चावलों को बड़े प्रेमके साथ चबा रहे हैं|
इधर श्री कृष्ण के इशारे पर अतिथि सत्कार में सुरुचिपूर्ण स्वादिष्ट भोजन तैयार हो
चुका था| दोनों मित्रों ने प्रेमपूर्वक भोजन किया| इसी तरह आदर-सत्कार के साथ सुदामा
सात दिनों तक द्वारकापुरी में रहे| “सात दिवस यहि विधि रहे, दिन- दिन आदर भाव| चित्त चल्यो घर चलन कौं, ताकर सुनो
बनाव||” इधर तो सुदामाजी बड़े आदर-सत्कार
के साथ द्वारिकापुरी में अपने बाल सखा श्री कृष्ण के साथ मौज-मजा में रह हैं| उधर
बिना सुदामा को सूचित किए ही कृष्ण ने
सुदमापुरी का कायापलट कर दिया| उसे बिलकुल द्वारकापुरी की तरह ही बना दिया| एक
प्रकार से सुदामापुरी द्वारकापुरी का प्रतिरूप ही बना दी गई | किन्तु सुदामा को
इसका कोई अंदाज नहीं हुआ| सुदामा जब चलने लगे तो कृष्ण ने विनोद करने के लिए उन्हें
बड़े रूखे भाव से बिना कुछ दिए ही, विदा कर दिया| सुदामा को यह अपेक्षा नहीं थी| जैसे
पैदल आए थे वैसे ही वापस कर दिए गए | कृष्ण के द्वारा सुदामा को इस तरह विदा कर
देना बड़ा अजीब लगा| वह सोचने लगे-
“वह
पुलकनि, वह उठ मिलनि, वह आदर की भांति| यह पठवनि गोपाल की कछु न जानी जाति ||”
जो
आशा सुदामा लेकर आए थे | उन्हें लगता है कि वह बिलकुल भी पूरी नहीं हुई| उन्हें
बड़ी ग्लानि हुई, पश्चाताप भी हुआ| वह श्री कृष्ण के प्रति सोचते हैं-अब वह राजा बन
गए तो क्या हुआ | पहले तो गोकुल में, वह तनिक दही या छाछ के लिए घर-घर भीक सी
मागते फिरते थे| “घर-घर मांगत भीक सी, तनिक दही के काज| का भयो जो अब भयो हरि
कौ राज-समाज||” लेकिन मन की वृति एक जैसी नहीं रहती है| अब उन्हें अपनी पत्नी
के प्रति भी क्षोभ उत्पन्न होता है| सोचते हैं, कि मैं तो आना ही नहीं चाहता था|
किन्तु पत्नी ने जबरास्ती धकेल कर कृष्ण के पास भेजा | उसे बड़ा विश्वास था कि
कृष्ण से उन्हें बहुत सारा धन मिल जाएगा| “हौं आवत नाहीं हुतो, वाही पठयो ठेलि|
अब कहियों घर जायकें, सब धन धरौ सकेलि ||” अब उनके मन की खीज फिर कृष्ण के
प्रति उमड़ आती है| कहते हैं-
बालापन
के मित्र हैं, कहा देंऊ मैं शाप| जैसौ हरि हमकों दियो, तैसौहि पावहीं आप||” सुदामा
का यह शाप कृष्ण के लिए तो एक प्रकार से वरदान बन गया| सुदामा जब अपनी नगरी में
पहुँचते हैं तो देख कर सुखद आश्चर्य का अनुभव करते हैं| वे दुबिधा में पड़ जाते हैं
कि कहीं वह रास्ता भटक कर फिर से द्वारकापुरी में ही तो नहीं पहुँच गए ? क्योंकि
सब कुछ तो यहाँ ठीक-ठीक द्वारकापुरी जैसा ही ठाठ है| वे अपनी झोंपड़ी को
खोजते-खोजते पूरे नगर का चक्कर लगा देते हैं, किन्तु उन्हें अपनी झौपड़ी कहीं दिखाई
नहीं देती| जहाँ उनकी झोंपड़ी थी वहां
सोने-चांदी के महल खड़े हुए थे और उनमें उनकी पत्नी सुबुद्धि अपनी दास-दासियों के
साथ रह रहीं थी| सुदामा देखते हैं-
“वैसेही राज-समाज वे ही, गज-बाज, घनो
मन संभ्रम छायो|
वैसेही कंचन के सब धाम, किधों फिरि भूलि
कैं द्वारका आयो|
भौंन बिलोकन को मग लोचन सींचत ही सब गाँव
मझायो|
पूछत पांडे फिरे सब
सौं, परि झोंपड़ि कौ कहूं शोध न पायो||”
इधर महलों की अट्टालिकाओं से उनकी पत्नी ने सुदामा को देख लिया, तो
वह उन्हें यह कह कर बुलाने लगी कि ये सब ‘आपके ही महल हैं’ | आपके मित्र भगवान
कृष्ण के कृपाभाव का परिणाम है-यह
सब| सुदामा उन्हें देखते रह जाते हैं | और
कहते हैं कि-
टूटी सी मड़ैया मेरी परी हुती याही ठौर, तामें
परों दुःख काटों, कहाँ हेम धाम री|
जेवर जड़ाऊ तुम साजे
प्रति अंग-अंग, सखी सोहें संग , वह छूंछी हुती छाम री|
तुम तौ पटंबर री ओढ़े हौ किनारीदार, सारी जरतारी,
वह ओढ़े कारी कमरी|
मेरी वा
पंडाइन तिहारी अनुहार पै, बिपदा
सताई वह पाई कहाँ पाँवरी||
अनेक प्रकार से सुदामा को समझाया गया कि यह सब आपका ही घर-गाँव है |
आपके बाल साख श्री कृष्ण की कृपा का ही परिणाम है, यह सब ठाठ-वाट | कवि कहते हैं –
“समुझायो पुनि कन्त को, मुदित गई लै गेह|
अन्वायो तुरतहि उबटि, सुचि सुगंध सौं देह||” इस प्रकार सुदामा को बड़ी मुश्किल
से यह समझ में आया कि कृष्ण ने प्रत्यक्ष में उसे कुछ न देकर, एक प्रकार से उसके
साथ विनोद किया है और सुदामापुरी में द्वारकापुरी के समान ही उसके के लिए सारे सुख
सुविधा के समान जुटा दिए गए | अब सुदामा अपने पूरे ठाट-वाट को देख कर भगवान श्री
कृष्ण के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और कभी अपनी पत्नी आभार मनाते हुए
कहते हैं –“जौ पै पतिवृता तू न देती उपदेश मोहि, एती कृपा द्वारिकेश मो पै कब
करते”|
यह मनुष्य मात्र का सुभाव है कि वह अछे-बुरे दिनों की याद करता ही
है| उसी भूमिका में सुदामा अपने वैभव के दिनों में अपने पूर्व जीवन की गरीबी के
रहन सहन को याद करटे हैं तथा वर्तमान जीवन की तुलना करते हए, कहते हैं-
“कै वह टूटी
सी छानि हुती, कहँ कंचन के सब धाम सुहावत|
कै पग में पनही न हुती, कहँ लै गजराजहु ठाढ़े
महावत|
भूमि कठोर पै रैन
कटै, कहँ कोमल सेज पै नींद न आवत|
कै जुरतो नहीं
कोदों सवां , प्रभु के परताप सौं दाख न भावत||”
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“धन्य-धन्य श्री कृष्ण जू , दीनन पै अनुकूल
धन्य सुदामा सहित तिय, कहि बरसत सुर फूल||
~डॉ. केशव प्रथमवीर
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