उदात्त जीवन (महापुरुष)

 


                              

                                  उदात्त जीवन

 

  हम सभी जानते हैं कि विद्यालयों में विभिन्न क्षेत्रों के महापुरुषों की जयंतियाँ या पुण्य तिथियाँ मनाईं जाती हैं| ज्ञान-विज्ञान, समाज, शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, धर्म-दर्शन, राजनीति आदि के क्षेत्र में ऐसे हजारों-लाखों महान व्यक्ति हुए हैं, जिनको उनकी जयंतियों तथा पुण्य तिथियों के अवसरों पर याद किया जाता है और बच्चों के कोमल मन पर यह अंकित करने का प्रयास किया जाता है कि उन्हें भी इन महापुरुषों का अनुकरण करना चाहिए| लेकिन विश्व के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न क्षेत्रों में जितने भी महापुरुष हुए, उनमें एक जैसे दो महापुरुष कभी और कहीं भी नहीं हुए| महापुरुष ही नहीं, सामान्यतः कोई भी एक जैसे दो व्यक्ति नहीं मिलते| इसलिए यह कहा जाता है कि सृष्टिकर्त्ता विधाता रूपी कुम्हार जिस सांचे से एक व्यक्ति को बनाता है, उसे वह तोड़ देता है| हरेक व्यक्ति के लिए वह एक नया साँचा गढ़ता है| इसलिए कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं होते| विधाता रूपी कुम्हार के रूपक पर ध्यान नहीं भी दें तो भी, यह स्पष्ट है कि न तो अनेक राम हुए, न अनेक बुद्ध  हुए, नहीं अनेक शिवाजी हुए, न अनेक महात्मा गांधी; ये सभी एक-एक ही हुए| 

तो फिर प्रश्न उठाता है कि हमें क्यों सुनाई जाती हैं महापुरुषों की कहानियाँ, और हम क्यों सुनें उनके जीवन वृतांत ? जब आज तक कोई दूसरा राम नहीं हुआ, कोई दूसरा बुद्ध नहीं हुआ तो अब कैसे कोई सुभाष या पटेल या गांधी हो सकता है? फिर हम क्यों पढ़ें या सुनें इनकी कथाएँ? यहाँ एक घटना की याद आ रही है| एक बार एक कन्या विद्यालय में एक वक्ता महोदय, “भारतीय वीरांगनाएं” नामक विषय पर भाषण दे रहे थे| भाषण के अंत में उन्होंने कन्याओं से प्रश्न पूछने को कहा| सामान्यत: ऐसे समय छात्र प्रश्न नहीं पूछते हैं| अब लंबे चौड़े भाषण सुनने में छात्रों की कोई विशेष रुचि नहीं होती| वे ऊब जाते हैं| फिर भी बहुत कहने पर एक छात्रा ने साहस किया और खड़ी हो गई| उसने पूछा, “मैं झांसी की रानी बनना चाहती हूँ| लेकिन कैसे बन सकती हूँ? न तो मैं रानी हूँ और न अब मैं रानी बन सकती हूँ| अब अपने देश में कोई राजा-रानी बन भी नहीं सकता और समझो कि यह अनहोनी हो भी जाए कि मैं रानी बन जाऊँ, तो भी मैं लडूंगी किससे? अंग्रेज तो अब यहाँ भारत में हें ही नहीं?  अब यहाँ उनका राज्य ही नहीं है|

उस छात्रा का यह प्रश्न सुन कर पूरे सभागृह में हंसी फूट पड़ी| वक्ता महोदय भी मुस्कराने लगे| क्षण भर बाद वक्ता ने हाथ उठा कर छात्राओं को शांत हो जाने के लिए कहा और फिर बोलने लगे,“इस बेटी को में साधुवाद देता हूँ| इन्होंने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है| दूसरी बात यह है कि इन्होंने प्रश्न पूछने का साहस किया है, जबकि यह प्रश्न अनेक छात्राओं के मन में भी हो सकता है| किसी अन्य छात्रा ने बोलने या प्रश्न उठाने का साहस नहीं किया| मैं इनके इस साहस के लिए शाबासी देता हूँ तथा इनके इस प्रश्न का अनुमोदन भी करता हूँ और मानता हूँ कि अब कैसे कोई महिला हूबहू रानी लक्ष्मीबाई बन सकती है? नहीं बन सकती| यदि आप किसी भी वीर-वीरांगनाओं के जीवन की घटनाओं का ही अनुकरण करेंगे तो असफल ही होंगे| कोई भी व्यक्ति किसी भी महापुरुष के जीवन की या संबधित घटनाओं की नक़ल या अनुकरण नहीं कर सकता| क्योंकि समय निरंतर परिवर्तनशील है| एक जैसी घटनाएं प्राय: फिर नहीं घटती हैं| अपवाद रूप में यह हो सकता है कि कभी कोई घटना पहले की जैसी किसी घटना की पुनरावृत्ति लगती हो, जैसा कि कहा जाता है कि ‘History repeats it self.  तो भी, बदली हुई परिस्थितियों में वह घटना ठीक पहले जैसी नहीं होती तथा उसके अनुसांगिक परिणाम भी पहले से भिन्न होते हैं| अत: इन बदली हुई परिस्थितियों में कोई व्यक्ति पहली घटनाओं के व्यक्तियों की तरह आँख मूंद कर कार्यवाही करेगा तो औंधे मुँह गिरेगा| अर्थात परिणाम उलटे होंगे|

इसलिए यह आवश्यक नहीं है, कि हम तभी महापुरुष बनेंगे जब हमारे जीवन में पूर्ववर्त्ती  महापुरुषों के जीवन की जैसी घटनाएं घटें और हम महापुरुष बन जाएँ| साथ ही यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि यदि कोई व्यक्ति महापुरुष बनने के लिए कुछ करता है तो उसका ध्यान सदैव इस बात की ओर ही रहेगा कि ‘मैं महापुरुष बन पाया या नहीं?’ उसकी दिलचस्पी उस काम की ओर नहीं रहेगी जिसके आधार पर कोई व्यक्ति महापुरुष कहलाता है, बल्कि यह दिखने या दिखाने की ओर ज्यादा रहेगी कि वह महापुरुष है| ऐसा व्यक्ति कभी भी महापुरुष नहीं हो सकता| वह असली नहीं, नकली होता है| ऐसे व्यक्ति की कलई खुलने में देर नहीं लगती| मानव जाति के इतिहास में कहीं भी किसी भी महापुरुष ने ‘महापुरुष’ बनने के उद्देश्य से कोई भी कार्य कभी भी प्रारभ नहीं किया| कोई भी कार्य या घटना किसी को महापुरुष नहीं बनाती हैं| अत: बात घटनाओं की नहीं है| घटनाएं किसी को भी महान नहीं बनातीं हैं और न घटनाएं किसी को छोटा बनातीं हैं| साथ ही यह बात भी है कि कोई भी घटना अपने आप में न तो छोटी होती है और नहीं बड़ी| बड़ा और छोटा होता है आपका नजरिया-आपका दृष्टिकोण| आप किसी घटना के प्रति कैसे सोचते हैं–किस तरह विचार करते हैं, घटनाओं के सन्दर्भ में आप अचूक निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं या नहीं और घटनाओं या परिस्थितियों के प्रति किस प्रकार की प्रतिक्रया करते हैं| यह प्रतिक्रिया शब्दों तक ही सीमित रह जाती है या सक्रियता में परिवर्तित होती है| ऐसी ही कुछ बातें हैं जो महत्वपूर्ण हैं| रानी लक्ष्मीबाई जैसा बनने के लिए रानी होना आवश्यक नहीं है और नहीं उस तरह का युध्द करना जरूरी है| उस समय में भी भारत के अंदर सैकड़ों रानियाँ थीं| लक्ष्मीबाई से अधिक वैभव तथा साधन संपन्न एवं चतुर भी थीं| अंग्रेज भी थे और उन्होंने जो लक्ष्मीबाई के साथ अन्याय का व्यवहार किया था, वैसा व्यवहार वे और भी अनेक राजाओं-रानियों तथा बादशाओं, नबावों और बेगमों के साथ कर चुके थे| तमाम राजाओं के राज्यों को उन्होंने किसी न किसी बहाने से छीन लिया था| रानियों और बेगमों के साथ अत्यंत अपमान का व्यवहार किया था| इन बातों के तमाम उल्लेख उस काल खंड के अखबारों में भरे पड़े हैं| सुभद्रा कुमारी चौहान की अमर कविता, “खूब लड़ी मरदानी वह तो झांसीवाली रानी थी” में इन बातों के संकेत मिलते हैं-

“रानी रोवें रनवासों में बेगम गम से थीं बेजार| उनके गहने-कपड़े बिकते कलकत्ते के बीच बजार|   सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार| कानपुर के गहने ले लो, लखनऊ के लो नौ लख हार|”

लेकिन रानी लक्ष्मीबाई को छोड़ कर किसी की हिम्मत नहीं हुई, अंग्रेजों के खिलाफ तलवार उठाने की| रानी अन्याय सहन करके, रोते हुए बैठी नहीं रहीं| वे अन्याय के साथ समझौता करने को राजी नहीं हुईं| वे गरजते हुए उठ खड़ी हुईं, “ मेरी झांसी, मैं नहीं दूंगी”| अन्य रानियों और बेगमों की तरह, आंसू बहाने की अपेक्षा उन्होंने अपने जीवन का बलिदान करना अधिक उचित समझा| अत: अन्याय के विरुध्द, हिम्मत के साथ उठ खड़े होने की यह जो प्रतिक्रया है, वह महत्वपूर्ण है| लक्ष्मीबाई जैसा बनने के लिए रानी होना आवश्यक नहीं और न लड़ाई के लिए अंग्रेजों का होना जरूरी है| जरूरी है, अन्याय के खिलाफ, अशुभ के खिलाफ, अमंगल के खिलाफ और जीवन की नकारात्मकता, निराशात्मकता तथा निष्क्रियता जैसे दुर्गुणों के खिलाफ उठ खड़े होने की हिम्मत का होना| कभी-कभी समाचार पत्रों में पढ़ने मिलता है कि किसी युवती ने दहेज माँगने वाले दूल्हे और उसके पिता को अपने दरवाजे पर आई हुई बरात के साथ बैरंग वापस कर दिया| लाख समझाने पर भी वह लालची दूल्हे के साथ विवाह रचाने को तैयार नहीं हुई| यह जो हिम्मत है, यह जो अपने आप विचार करने की क्षमता है और अपने विवेक पूर्वक किए गए फैसलों पर डटे रहने की दृढ़ता है, ऐसी ही विभिन्न प्रकार की और भी विशेषताएँ हैं, जो किसी भी युवती को रानी लक्ष्मीबाई की तरह बना सकती हैं और किसी भी युवक को विवेकानंद, या सुभाष, या शहीद भगत सिंह जैसी गरिमा प्रदान करा सकती हैं|

                अब प्रश्न यह उठाता है कि ऊपर जिन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है, क्या वे जन्म जात होती हैं ? क्या वे सीखी-सिखाई जा सकती हैं? या विकासित की जा सकती हैं? यदि वे विकसित की जा सकती हैं तो कैसे? इन सभी प्रश्नों के उत्तर गणित की भाषा – दो और दो चार की तरह तो नहीं दिए जा सकते| क्योंकि मानवीय मष्तिष्क, मानवीय जीवन तथा मानवीय कार्य-व्यवहार अत्यंत ही जटिल, संश्लिष्ट और निरंतर प्रगतिमान स्वरूप का है| यहाँ इस छोटे से आलेख में उसका पूर्ण रूप से  विश्लेषण करना संभव नहीं है| फिर भी, जहाँ प्रश्न हैं वहाँ उत्तर भी खोजे जा सकते हैं|

इस सन्दर्भ में सर्व प्रथम यह समझ लेना चाहिए कि, शारीरिक आकार-प्रकार, रंग-रूप, गठन, आदि की दृष्टि से महापुरुषों का कोई विशेष जाति-वर्ग नहीं होता है| बाहरी दृष्टि से सभी सामान्य मनुष्यों की तरह, वे भी सर्व सामान्य जैसे ही होते हैं| हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों में ”सरहदी गांधी” कहलाने वाले ‘बादशाह अब्दुल गफ्फार खां’ छह फीट से भी अधिक ऊंचे थे| उनके हाथ-पैर इतने मोटे थे कि अंग्रेजी पुलिस की लोहे की हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ उनको सहज रूप में नहीं पहनाई जा सकतीं थीं| वे उनके हाथ पैरों में हथौड़े से ठोकी जाती थीं| दूसरी ओर महात्मा गांधी का शरीर सामान्य-औसत ऊंचाई का था| इस क्रम में, लाल बहादुर शास्त्री सिर्फ पांच फीट चार इंच ही ऊंचे थे| उक्त दोनों महापुरुषों की तुलना में शास्त्री महोदय “बौने” ही थे| भारत के प्रधान मंत्री के रूप में इसी बौने-से आदमी ने, पाकिस्तान के तत्कालीन प्रेसीडेंट, जो लगभग साढ़े छः फीट ऊंचे थे, जनरल अयूब खां साहब को, संन 1965 के युद्ध में धूल चटा दी थी| युद्ध के बाद संधि वार्ता के लिए जब वे ताशकंद में जनरल अयूब खां साहब से पहली बार मिले, तब हाथ मिलाते हुए जो वार्तालाप हुआ, वह यहाँ  स्मरणीय है| अयूब खां साहब ने शास्त्रीजी के नाटेपन पर व्यंग करते हुए कहा, “शास्त्री जी! आपसे मिलते समय मुझे अपनी गर्दन झुकानी पड़ती है|” शास्त्रीजी ने तपाक से छाती तान कर नौले पर दहला मारा-“ हाँ, खां साहब! याद रखिए मैं तो हमेशा गर्दन तान कर बातें करता हूँ|” ये थी हिमालय जैसी ऊंचाई उस नाटे आदमी की| इसी तरह “भारत रत्न” महर्षि धों. के. कर्वे भी पांच फीट दो इंच के ही थे| परन्तु संपूर्ण एशिया में महिलाओं की शिक्षा-दीक्षा के लिए, पहले विश्व विद्यालय-“ श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकरसी महिला विश्व विद्यालय, मुंबई”, की स्थापना कर के उन्होंने समय की छाती पर हमेशा के लिए एक मील का पत्थर गाढ़ दिया| तात्पर्य यही है कि बाहरी रूप से महापुरुषों की कोई विशेष पहचान नहीं हो सकती|

महापुरुष वही कहलाता है जिसने महान कार्य किए हों| अब महान कार्य के सन्दर्भ में भी प्रश्न उठाया जा सकता है, कौन सा कार्य महान है और कौन सा नहीं? इसका उत्तर भी ऊपर की तरह ही है| बाहरी तौर से महान कार्यों की भी कोई अलग से श्रेणी या सूची नहीं हो सकती| मानव जीवन का प्रत्येक कार्य महान है और वही छोटा भी है| हत्या करने वाले डाकुओं को पकड़ कर फाँसी पर लटकाया जाता है और दूसरी ओर युद्ध में अधिकाधिक दुश्मनों की हत्या करने वाले सैनिकों को “परम वीर चक्र” से पुरस्कृत किया जाता है| प्रतिदिन रास्तों, गलियों और गंदी नालियों की सफाई करने वाले कामगारों को कोई महान नहीं कहता| लेकिन गाँव-गाँव की गलियों में, गंदी नालियों की सफाई करने वाले, धोबी जाति के “‘ढेबू’” नामक अनपढ़ व्यक्ति को, आज एक महान संत,”गाडगे महाराज” के रूप में जाना और माना जाता है| आज अनेक विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्व विद्यालयों को उनके नाम का स्मारक बनाया गया है| इसी महापुरुष के नाम को सम्मानित करने, “संत गाडगे निर्मल ग्राम योजना” अभियान, महाराष्ट्र में ही नहीं, सम्पूर्ण भारत में चलाया जा रहा है| तात्पर्य यही है कि कोई भी कार्य न तो छोटा होता है और न बड़ा| छोटा-बड़ा होता है, कर्त्ता का दृष्टिकोण, उसका उद्देश्य और उसकी भावनाएँ और उसकी व्यापकता| कोई भी कार्य जितने निस्वार्थ रूप से, सिर्फ विशुद्ध कर्तव्य भाव अथवा ‘सर्व जन हिताय-सर्व जन सुखाय’ की उदात्त भावना से किया जाता है, वही कार्य उतना ही महान बन जाता है| लेकिन ‘उदात्त दृष्टिकोण’ अथवा ‘सर्वजन हिताय’ का उच्च उद्देश्य या निस्वार्थ कर्तव्य भाव से कर्म करने की यह ‘विशिष्ट क्षमता’, जो मनुष्य की बहुत ऊंची मानसिक अवस्था है, सहज रूप में ही प्राप्त नहीं होती| यदि यह ‘विशिष्ट क्षमता’ सहज रूप में ही प्राप्त होती तो कितना अच्छा होता! फिर किसी को महापुरुषों के जीवन चरित्र पढ़ने-पढ़ाने की आवश्यकता नहीं होती|

मनुष्य अन्य प्राणियों से इसलिए भी श्रेष्ठ है कि वह अपनी मानसिक अवस्था का उन्नयन कर सकता है अर्थात ऊँचा उठा सकता है| वह उसे उच्च से उच्चत्तर तथा उच्चत्तम अवस्था तक ले जा सकता है| मनुष्य के भीतर जो पशुत्व है या जो शैतानियत है उससे छुटकारा पाने की क्षमता भी मनुष्य के ही भीतर मौजूद है| गांधी जी ने बचपन में चोरी की तथा माता-पिता से छिपकर मांस भक्षण भी किया और बाबा साहेब आम्बेडकर की जीवनी में भी चोरी करने का उल्लेख मिलता है| लेकिन चोरी करने की आदत को उन्होंने जीवन भर अपने सिर पर ढोया नहीं| जल्दी ही उन्होंने इस बुरी बात से अपने आप को अलग कर लिया और फिर जीवन भर कभी चोरी नहीं की| यहाँ इस बात का उल्लेख सिर्फ यह स्पष्ट करने के लिए किया जा रहा है कि संसार के सभी महापुरुष प्रारम्भ में सामान्य आदमियों की तरह ही, न्यूनाधिक मात्रा में भलाई-बुराइयों के साथ ही पैदा हुए थे| सभी मनुष्यों की तरह ही महापुरुषों के प्रारंभिक जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, छल, कपट, झूठ, चोरी, कृतघ्नता, कठोरता-बर्बरता, स्वार्थीपन, आलस्य, निकम्मापन, दीर्घसूत्रता, बहानेवाजी, दुराव-छिपाव इत्यादि नकारात्मक कही जाने वाली प्रवृत्तियों के साथ-साथ प्रेम, दया, करुणा, क्षमा, मैत्री, कृतज्ञता, नम्रता, मृदुता, निरहंकारिता, नि:स्वार्थता, श्रद्धा, सेवा, सहयोग, सहायता, संतोष, शील, सत्यता, सरलता, सृजनशीलता, श्रमशीलता, त्याग, उत्सर्ग, उत्साह, उल्लास, उद्यमता, उदारता, उदात्तता आदि सकारात्मक प्रवृत्तियां भी गुप्त या प्रकट रूप में उपस्थित रहती हैं| एक दृष्टि से मानव जीवन की सार्थकता अपने व्यक्तित्व की नकारात्मक वृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष करने और सकारात्मक प्रवृत्तियों के विकास का प्रयास करने में है| इस कार्य में जो जितनी मात्रा में सफल होता है, वह उतनी ही मात्रा में महापुरुषत्व की ओर अग्रसर होता है| महापुरुषों के जीवन चरित्रों से यही सन्देश प्राप्त होता है कि जिस प्रकार उन्होंने अपनी नकारात्मक प्रवृत्तियों से संघर्ष करते हुए छुटकारा पाया तथा प्रयास पूर्वक अपने आपको महामानव की उच्चावस्था तक पहुंचाया, उसी तरह प्रत्येक मनुष्य प्रयत्न कर सकता है| महामानव बनने की उनकी सारी प्रक्रिया आगे की पीढ़ी के लिए दीप स्तंभ का कार्य करती है| उनका जीवन संघर्ष सभी के लिए प्रेरणा का प्रखर स्रोत बना जाता है|  महापुरुषों के जीवन चरित्र पढ़ने- पढ़ाने की सार्थकता यही है|

इस सन्दर्भ में कुछ और चर्चा करने से पूर्व एक महत्वपूर्ण प्रश्न तो यह है कि किसी को भी महापुरुष बनने का उपदेश क्यों देना चाहिए और क्यों कोई महापुरुष बनने की कोशिश करे? इस प्रश्न के उत्तर में कुछ आधारभूत बातें जान लेना आवश्यक है| सबसे प्रमुख बात यह है कि हर व्यक्ति सुख या आनंद की खोज में है| सामान्यत: साधारण व्यक्ति अच्छे खान-पान, रहन-सहन आदि में सुख की खोज करते हैं| कुछ व्यक्ति इससे आगे बढ़ कर सामाजिक प्रतिष्ठा या प्रशंसा में सुख का अनुभव करते हैं| मानवीय कार्य कलापों के लिए प्रतिष्ठा और प्रशंसा एक बहुत बड़ा प्रेरक तत्व है| महापुरुष बनने की प्रेरणा के पीछे बहुत सीमा तक प्रशंसा की चाह भी कार्य करती है| इस चाह को उकसाने या विकसित करने हेतु ही महापुरुषों के जीवन चरित्रों की विशेषताओं का अनुकरण करने को कहा जाता है| किन्तु कोई भी उत्तम श्रेणी का महापुरुष प्रशंसा पाने के लिए कार्य नहीं करता| प्रशंसा या प्रतिष्ठा को तो वह अपने मार्ग की बाधा समझ कर उसकी उपेक्षा करता है| यह बात अलग है कि प्रशंसा या प्रतिष्ठा उनके पीछे-पीछे दौड़ती है| महात्मा ‘रामतीर्थ’ कहा करते थे,

“भागती फिरती थी दुनिया, जब तलब करते थे हम|

अब जो नफरत हमने की है, बे तलब आने को है||”

प्रशंसा या प्रतिष्ठा के सुख से भी एक बड़ा सुख है और वह है-‘आत्मसुख’| जिस तरह एक माँ अपनी संतान के हित में स्वयं कष्ट उठाकर सुख-संतोष का अनुभव करती है, उस प्रकार का सुख है यह| इस प्रकार का सुख वात्सल्य, स्नेह, प्रेम, करुणा, श्रद्धा आदि मनोभावों से प्रेरित होकर किए गए कार्यों  से प्राप्त होता है| ऐसा सुख जो अपनेपन के विस्तार और सघनता के कारण उत्पन्न होता है| जब किसी व्यक्ति के अपनेपन का सघन विस्तार हो जाता है, तब इस प्रकार के आत्मसुख में भी उतनी ही सघनता तथा विस्तार की वृद्धि होती है| महाकवि जय शंकर प्रसाद कहते हैं- “औरों को हँसता देखो मनु, हँसो और सुख पाओ| अपने सुख को विस्तृत करलो, जग को सुखी बनाओ||” इस प्रकार के सुख का विस्तार होते-होते वह उस उच्च भूमि तक पहुंच जाता है जिसे ‘परमसुख’ या ‘परमानन्द’ कहते हैं| यह सुख प्रशंसा या सामाजिक प्रतिष्ठा के सुख से असंख्य गुना श्रेष्ठ होता है| प्रशंसा या प्रतिष्ठा ईर्ष्या-द्वेष की शिकार बन जाती है और कर्त्ता को पथ भ्रष्ट करा सकती है| यही कारण है कि परमसुख की साधना करनेवाले व्यक्ति, ‘प्रतिष्ठा सूकरी विष्टा, गौरवं घोर रौरवं’ कह कर इसकी उपेक्षा करते हैं| इसलिए चिंतकों और विचारकों के मत से उक्त ‘परमसुख’ तक पहुंचना ही मानव जीवन का उद्देश्य है| यही परमसुख ‘मोक्ष’, मुक्ति, निर्वाण, आदि नामों से जाना जाता है| इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए महापुरुषों के सद्गुणों का अनुसरण करने के लिए कहा गया है| युधिष्ठर ने यक्ष को यही उत्तर दिया था, ‘महाजनो एन गता स पन्थ:’|

इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए आदमी को एक प्रदीर्घ साधना या संस्कार प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है| यह संस्कार प्रक्रिया थोड़ी-बहुत मात्रा में किसी को वंशानुगत रूप में माता-पिता से प्राप्त हो सकती है, परिवार और परिवेश से मिल सकती है तथा शिक्षा-दीक्षा से भी प्राप्त की जा सकती है| जैसे, कुष्ट रोगियों, अन्धों तथा अन्य विकलांगों को मानवोचित सम्मान के साथ जीवन-कला सिखानेवाले “बाबा आमटे” के आश्रमों को अब उनके सुपुत्र डाक्टर प्रकाश आमटे, अपने माता पिता की भावनाओं के अनुकूल ही सफलता पूर्वक चला रहे हैं|  किन्तु विरासती महानता को आगे बढ़ाने वाले व्यक्ति बिरले ही होते हैं| देखा यही गया है कि मानवीय जीवन की उपरोक्त उच्च मानसिक अवस्था को प्राप्त करने के लिए, व्यक्ति को स्वयं ही साधना के सँकरे, फिसलन भरे और कँटीले रास्ते पर निरंतर चलना पड़ता है| घने अंधकार में दीप शिखा की तरह तिल-तिल कर जलना पड़ता है| भगवत गीता का वचन है कि, “या निशा सर्व भूतानां तस्यां जागर्ति सयंमी|” अर्थात  संपूर्ण प्राणियों के लिए जो रात है, उस समय संयमी-ध्येयवादी पुरुष जागा हुआ रहता है| इसी बात को अंग्रेजी में कहा जाता कि, “when the whole world was sleeping, the great men were creeping towards their aims.” कहने का तात्पर्य यही है कि जब सारी दुनिया के लोग, मौज-मस्ती के साथ गफलत भरा जीवन जी रहे  होते हैं, तब भविष्य के महापुरुष अपने उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु, घनघोर संघर्ष के बीच, पूरे होश हवास के साथ चींटी चाल से ही क्यों न हो, आगे बढ़ रहे होते हैं| यहाँ ‘तिल-तिल कर जलने’ और ‘चींटी चाल चलने’ में जो लाक्षणिकता है उसका थोड़ा स्पष्टीकरण आवश्यक लगता है-

ऊपर मनुष्य जीवन की जिन नकारात्मक प्रवृत्तियों का उल्लेख किया गया है, उनसे छुटकारा पाने में, अर्थात उनको सकारात्मक रूप में परिवर्तित करने के लिए, अपने ही मन के खिलाफ जब किसी व्यक्ति को जो क्षण-क्षण संघर्ष करना पड़ता है, कष्ट उठाना पड़ता है, तथा अपने आप से ही युद्ध करना पडता है, उसी का अर्थ है तिल-तिल कर जलना| इसी तरह सकारात्मक प्रवृत्तियों को अपनाने में विफलताओं तथा बाधाओं का सामना करना पड़ता है| कभी-कभी ये असफलताएं और बाधाएं बड़ी  भयंकर और अपमान दायक होती हैं| फिर भी गंभीर सहनशीलता के साथ धैर्य पूर्वक निरंतर प्रयत्न में लगे रहना पड़ता है| प्रयत्न में लगे रहने के कारण सुख-सुविधाओं को तिलांजली देनी पड़ती है| सगे संबंधियों की अपेक्षाओं को भंग होना पड़ता है, जिसके कारण परिवार-परिवेश में तनाव उत्पन्न होता है| परिणामत: खीज, चिढ़, आक्रोश-क्रोध का साम्राज्य पसरने लगता है| क्रोध के साम्राज्य का अर्थ है-युद्ध अर्थात विध्वंश| संत श्रेष्ट तुकाराम महाराज इसलिए ही कहते हैं कि, “रात अन् दिवस आम्हा युद्धाचा प्रसंग”| अर्थात दिन-रात हमारे भीतर युद्ध चल रहा है| इस सबका सामना करने के लिए व्यक्ति को धरती जैसी सहन शीलता, आकाश जैसी विशालता (उदारता) और सागर जैसी गंभीरता अपनानी पड़ती है| इस प्रकार विघ्न-बाधाओं के बीच आगे बढ़ने की गति थोड़ी देर के लिए यदि (चींटी चाल जैसी) धीमी भी पड़ जाए तो इसमें आश्चर्य ही क्या है| मंडाले की जेल में लो. तिलक ने “गीता रहस्य” किन विपरीत परिस्थितियों में और किन असुविधाओं में लिखा, यह उनकी जीवनी को विस्तार से पढ़ने पर ही जाना जा सकता है| इसी प्रकार सरदार पटेल तथा डा. आम्बेडकर ने विदेशों में पढ़ाई करते समय क्या-क्या कष्ट भोगे तथा किन-किन असुविधाओं का सामना किया, यह गहनता से उनकी जीवनी का अध्ययन किए बिना कैसे जाना जा सकता है| अफ्रीका प्रवास के समय मोहन दास करम चंद गांधी को, अंग्रेजों द्वारा किए गए घोर अपमान को सहन करने और गंभीरता से विचार करने को बाध्य होना पड़ा, जो उन्हें महात्मा गांधी बनने के मार्ग की ओर ले गया| उस सारे आत्म संघर्ष की प्रक्रिया को समझने और उनके दृढ निश्चयी व्यक्तित्व को जानने के लिए गांधी जीवन-साहित्य को पढ़े बिना और रास्ता ही क्या है? दृढ़ निश्चयी व्यक्ति कभी भी अपने संकल्प से विचलित नहीं होते हैं| ऐसे व्यक्ति अच्छी तरह जानते हैं कि, ““चल पड़े हैं कदम तो मंजिल तक पहुँच ही जायेंगे| ताकत पैरों में नहीं, इरादों में होती है||”” जिनके पैर भले ही जमीन में धंसे हुए हों, लेकिन इरादे बुलंद हों और आँखें अंतरिक्ष को भेद रही हों, वे, देर-अबेर ही सही, अपनी मंजिल पर अवश्य ही पहुँचते हैं| वे छोटी मोटी उपलब्धियों के मोह जाल में फँस कर वहीं रुक नहीं जाते, उनकी आँखें लक्ष्य पर टिकी होती हैं| उनकी वाणी का मंत्र होता है-

                  “शान्ति भवन में टिक रहना ही, इस जीवन का लक्ष्य नहीं|

                   इसे पहुँचना उस मंजिल तक, जिसके आगे राह नहीं||”

महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविन्द सिंह, समर्थ स्वामी रामदास, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा ज्योतिराव फुले, लोकमान्य बाळ गंगाधर तिळक, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर शहीद बटकेश्वर दत्त, सरदार भगत सिंह, संत गाडगे महाराज, साने गुरु जी, कर्मवीर भाऊराव पाटील, अन्ना हजारे, योगाचार्य बाबा रामदेव, अमेरिका से दास प्रथा को नष्ट करने वाले प्रेसीडेंट इब्राहिम लिंकन, अमेरिका में अफ्रीकी मूल के रहवासियों के लिए दिन-रात अथक श्रम करने वाले वैज्ञानिक- “जार्ज डब्ल्यू. कार्वर”, अफ्रीका के गांधी कहे जाने वाले प्रेसीडेंट नेल्सन मंडेला, सन १९९१ में नोबल पुरस्कार से सम्मानित अपने पड़ौसी देश-म्यांमार की क्रांतिकारी नेता- “अंग सां सू की” ( AUNG SAN SU KYI )  जैसे असंख्य महापुरुषों के चरित्र इन तथ्यों के जीते जागते उदाहरण हैं| इन महापुरुषों के जीवन चरित्रों का गहन अध्ययन किया जाए तो यह तथ्य सामने आता है कि इनको महान बनाने वाली बातें बहुत कुछ सामान्य सी हैं जिन्हें हर कोई जानता तो है, किन्तु उन्हें अपने आचरण में गंभीरता से लागू नहीं कर पाता है| जो इन्हें अपना लेता है वही उस श्रेणी में पहुँच जाता है| जैसे सभी मनुष्यों के जीवन में ‘परिश्रम शीलता’ का गुण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, आओ इस पर थोड़ा विचार करें-

ऊपर कहा गया है कि ‘महान कार्य’ करने वाला ही ‘महापुरुष’ कहलाता है| महान कार्य के लिए महान परिश्रम भी अपेक्षित है| मनीषियों का मानना है कि परिश्रम ही प्रतिभा है| बिना परिश्रम के किसी भी प्रतिभा का समुचित विकास नहीं हो सकता| परिश्रम ही उद्यम शीलता है| उद्यम शीलता से ही नाना प्रकार की उपलब्धियाँ और संमृद्धियाँ प्राप्त होतीं हैं| उद्यम शीलता के लिए समय का नियोजन करना परम आवश्यक है| जो व्यक्ति समय को बरबाद करता है, समय भी उसे बरबाद किए बिना नहीं छोड़ता| कहते हैं कि लो. तिळक जब अपने अंतिम समय पर बेचैनी से गुजर रहे थे, तब किसी ने उनसे पूछा कि अब आप कैसा महसूस कर रहे हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि, “मैंने बहुत सारा समय यों ही बरबाद किया, अब समय मुझे बरबाद करने पर तुल गया है| मांगने पर भी अब पांच मिनट नहीं मिल रहीं हैं|” सम्राट अकबर के एक नवरत्न, ‘अब्दुल रहीम खां खाना’ समय के संबंध में कहते हैं-

 “समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक| रहिमन चतुरन चित लगी, समय चूक की हूक|”

गांधी जी की डायरियां पढ़ने से पता चलता है किस प्रकार वे अपना जीवन घड़ी की सूई के अनुसार चलाते थे| सभी के पास दिन रात में चौबीस घंटों का समय ही होता है| गांधी जी के पास भी २४ घंटे ही थे| किन्तु कितने प्रकार के काम वे इन २४ घंटों में किया करते थे यह देख कर आश्चर्य होता है| आटे की चक्की चलाना, सूत कातना, परचुरे शास्त्री जैसे कुष्ट रोगियों की अपने हाथ से मरहम पट्टी करना, नित्य घूमने जाना, दोंनों समय सामूहिक प्रार्थना करना, प्रार्थना सभा में प्रवचन देना, लोगों को निसर्गोपचार की शिक्षा देना, सुबह से शाम तक देश विदेश के लोगों से मिलना, उनसे विभिन्न समस्याओं पर चर्चा करना, अपनी साप्ताहिक और पाक्षिक पत्रिकाओं के लिए संपादकीय लेख लिखना, प्रति दिन आए हुए पत्रों के उत्तर भी उसी दिन लिख देना, रात्रि विश्राम से पूर्व प्रति दिन डायरी लेखन करना और भी न जाने कितने प्रकार के कार्यों को वे प्रतिदिन अंजाम देते थे| यह सब कुछ ‘समय प्रबंधन’ की कला पर निर्भर करता है| जो लोग ‘समय प्रबंधन’ ( time management) पर ध्यान नहीं देते, वे ही समय के अभाव का रोना धोना करते रहते हैं|

समय नियोजन का सारा महल ‘निरालस्य’ या ‘अप्रमाद’ की नींव पर खड़ा होता है| यह नींव तनिक भी हिली नहीं कि समय नियोजन का पूरा महल, तास के पत्तों के महल की तरह क्षण भर में बिखर जाता है| प्रमाद मनुष्य का सबसे प्रमुख तथा प्रवल शत्रु है| जीवन के संग्राम में सबसे पहला युद्ध प्रमाद के साथ ही लड़ा जाता है| जो इसमें विजयी होता है, वही उद्यम शीलता के क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है| व्यक्ति कितना ही बलवान हो, कितना ही बुद्धिमान हो, कितना ही प्रतिभाशाली हो, कितना ही चिंतक-विचारक,ज्ञानी और वक्ता हो, यदि वह अपने व्यक्तित्व में निहित प्रमाद को परास्त नहीं कर सकता तो कुछ भी नहीं कर सकता| प्रमाद कैसे परास्त किया जाता है? प्रमाद परास्त किया जाता है, ‘संकल्प’ से| “कौंन कहता है, कि आसमां में सूराख नहीं होता! एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो|” संकल्प में बड़ी शक्ति होती है| संकल्प की दृष्टि से मनुष्यों के तीन वर्ग किए जा सकते हैं-एक वे जो सोच समझ कर एक बार संकल्प करते हैं, फिर चाहे मौत ही क्यों न आ जाए वे अपने सकल्प पर अंगद के पैर की तरह अडिग रहते हैं| ये उत्तम श्रेणी के व्यक्ति कहलाते हैं| ऐसे व्यक्तियों के संबंध ही ‘राजर्षि भर्तृहरि’ की टिप्पणी है-

         “निन्दन्तु नीतिनिपुण: यदि वा स्तुवन्तु| लक्ष्मी: समाविशतु,गच्छतु वा यथेष्टम्|

          अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा| न्यैयात्पथ: प्रवचलन्ति पदं न धीर:||”

भाव यह है कि ‘नीति शास्त्री निंदा करें या स्तुति, लक्ष्मी आए, चली जाए अथवा बनी रहे| मौत आज ही आ जाए या युगों बाद आए| अपने संकल्पित न्याययुक्त पथ पर चलने वाले धीर पुरुष एक कदम भी विचलित नहीं होते’| दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति इस तथ्य को हर समय याद रखते हैं कि मौत एक दिन ही आ सकती है, बार-बार नहीं| उससे क्या डरना है! 

दूसरी श्रेणी के व्यक्ति वे होते हैं जिनका संकल्प बार-बार टूटता है, किन्तु वे हार नहीं मानते| वे गिरते-फिसलते अपनी मंजिल पर पहुँच ही जाते हैं| ऐसे ही किसी व्यक्ति ने कहा है कि, “मैं चढ़ गया हिमालय, गिर-गिर फिसल कर”| और तीसरी श्रेणी के लोग वे होते हैं जो संकल्प तो करते हैं बड़े जोर-शोर के साथ, किन्तु एकाध कदम चलने में उनकी दम फूल जाती है और हार मान कर बैठ जाते हैं| इसी तरह के हारे हुए लोगों के बारे में किसी शायर ने ठीक ही लिखा है- “न पूछो कौंन हैं, क्यों राह में लाचार बैठे हैं| मुसाफिर हैं, सफर करने की हिम्मत हार बैठे हैं|”

संकल्प मन की दृढ़ता का ही रूप है| मनुष्य के उत्थान और पतन का कारण उसके मन को ही माना जाता है| हमारे देश के हर युग के मनीषियों ने मन की क्षमता के संबंध में अपने-अपने तरीके से हर समय  लोगों को चेताया है- मनु स्मृति का वचन है-“मन एव मनुष्याणां कारण बन्ध मोक्षयो:” अर्थात मनुष्य का मन ही उसके बंधन और मोक्ष का कारण है| आदि शंकराचार्य इसी बात को प्रश्नोत्तर रूप में यों लिखते हैं-“ विश्व जितेन केन:? मनहि एन:”| संसार किसने जीता? जिसने मन जीता| छत्रपति शिवाजी महाराज के सद्गुरु समर्थ स्वामी रामदास ने मन को ‘सज्जन’ कह कर, २०५ मराठी छंदों में उसका प्रबोधन किया है|  लोक मानस में बहु प्रचलित पंक्तियाँ हैं -

 “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत| मन ही बैरी आपनो, मन ही अपनो मीत||”          

इसलिए मन की साधना के संकरे, कंकरीले, कँटीले, और रपटीले पथ को पार करते हुए जो कोई भी व्यक्ति मानव कल्याण की उदात्त भावना से कार्य संपन्न करता है, वही महापुरुषत्व की अर्थवत्ता धारण करता है| समर्थ स्वामी रामदास का वचन है-

“केल्याने होत आहे रे| आधी केले चि पाहिजे||”अर्थात करने से ही सब कुछ होता है, पहले करके तो देखो| आजके दिन (२४अगस्त २०११) ‘किसन बाबुराव उर्फ अन्ना हजारे’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है|

 

~केशव प्रथमवीर

 

                  

           

   

           

                                   

                               

 

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