नीति शास्त्र और गिरधर कविराय की कुंडलियाँ
नीति शास्त्र और गिरधर कविराय की कुंडलियाँ
नीति-मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक-सामाजिक जीवन को सरल, सुखद, समृद्ध तथा उदात्त या ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए, कुछ विधि-निषेधात्मक व्यवहारिक नियम-कायदा बनाए हैं | एक प्रकार से ये नियम-कायदा
समाज
हित की चिंता करने वाले मनीषियों तथा गुरुजनों जैसे श्रेष्ठ और जेष्ठ जनों ने अपने और अपने पूर्वजों के अनुभवों के आधार निर्देशित किये हैं, ताकि सामान्य जनों का जीवन
पथ आलोकित हो सके| एक तरह से ये व्यापक समाज के हित में दिए गए आदेश या उपदेश ही हैं| इन्हीं आदेशों, उपदेशों-निर्देशों या नियमों की परंपरा को 'नीति-नियम’ कहा गया है | छोटे स्तर पर‘रीति-रिवाज’ भी एक प्रकार के निति-नियम ही हैं| नीति से ही 'नैतिक' विशेषण तथा 'नैतिकता' जैसी भाव वाचक संज्ञा का उद्गम हुआ है| नैतिक जीवन ही पवित्र जीवन की पहली और प्रमुख सीढ़ी मानी जाती है|क्योंकि नीति नियमों का विवेक पूर्ण पालन ही ‘आत्मानुशासन’ है| बिना आत्मानुशासन के कोई व्यक्ति, परिवार या समाज या राष्ट्र समुचित उन्नति नहीं कर सकता| जब व्यक्ति आत्मानुशासन का पालन नहीं करते,तब अराजकता पैदा हो जाती है और अराजकता पतन का कारण बन जाती है| नीति-नियमों को 'बोध वाक्य', 'सुभाषित' या कभी-कभी ‘लोकोक्ति’ या 'कहावत' आदि के रूप में भी जाना-पहचाना जाता है|ये नीति-नियम विभिन्न मानव समूहों में,विभिन्न देश,काल तथा परिस्थितियों के अनुसार बनते और मिटते भी रहते हैं|विशेष तौर पर ‘रीति-रिवाज’ जल्दी बदलते हैं|जब रीति-रिवाज काल बाह्य हो जाएँ अर्थात जब वे अपनी प्रासंगिगता खो बैठें, तब वे ‘रूढ़ परंपरा’ (वासी; ताजगी रहित; मृत प्राय:) कहलाती हैं| फिर भी जो लोग उनसे चिपके रहते हैं, उन्हें‘रूढ़िवादी’ कहा जाता है, और वे प्रबुद्धजनों की हँसी का पात्र बन जाते हैं| रूढ़ रीति-रिवाज प्रगति में बाधा पहुंचाते हैं| अत: उन्हें यथाशीघ्र त्यागने में ही भलाई है|किन्तु ऎसी रूढ़ परंपराओं को तोड़ने का साहस हरेक में नहीं होता, उसके लिए छप्पन इंच का सीना चाहिए| रूढ़िवादी लोगों की छींटा
कसी हरेक से सहन नहीं हो पाती|
नीति-नियमों का ही विकास 'विधि' अर्थात,‘क़ानून’ या ‘लॉ’ के रूप में हुआ है|विधि या क़ानून और नैतिक नियमों में एक अंतर दिखाई देता है, वह है कि, क़ानून, शासन या विधान सभाओं द्वारा प्राय: लिखित रूप में बनाए जाते हैं और उनका पालन करना संबंधित नागरिकों के लिए अनिवार्य होता है| यदि कोई व्यक्ति क़ानून तोड़ता है तो शासन उसे दण्डित करता है| नीति-नियम और रीति-रिवाज समाज में विकसित होते हैं और प्राय:मौखिक रूप में ही प्रचलित होते रहते हैं| उनका पालन न करने पर संबंधित समाज उस व्यक्ति को हीन या बुरी दृष्टि से देखने लगता है और कभी-कभी उसे अपने तरीके से दंडित भी करता है |जैसे समाज से वहिष्कार, या आर्थिक दंड , या समाज को भोज खिलाना ,इसी तरह के और तरीके भी हो सकते हैं|
कुछ नीति-नियम ऐसे भी होते हैं, जो कबीलों, जातियों, धर्म-संप्रदायों,तथा राष्ट्रों की सीमाओं से ऊपर उठ कर, सार्वजनीन, सार्वदेशिक तथा सार्वकालिक रूप धारण करते हैं|जैसे- इस निति वचन पर गौर करें -"एक व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए,जैसा वह अपने प्रति दूसरों से अपेक्षा करता है|" यदि मैं यह चाहता हूं कि मुझे कोई धोखा न दे, तो मैं भी किसी को धोखा न दूँ| अथवा मनुस्मृति (4/138) का यह वचन भी ऐसा ही है-"सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यं अप्रियं| प्रियंचनानृतम् ब्रूयात्एष धर्मसनातन"|(ब्रूयात्=कहना, बोलना| नानृतम=नअनृतं, असत्य भी नहीं|) इसी प्रकार के और भी असंख्य ऐसे बोध वाक्य हैं, जिन्हें सार्वजनीन, सार्वदेशिक तथा सर्वकालिक नीति वचन कह सकते हैं, क्योंकि इन वाक्यों में निहित उपदेशों को आचरण में लाने पर, संसार के सभी मनुष्यों के जीवन में सुखद स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं|
साहित्य और नीति साहित्य -‘नीति’ की दृष्टि से साहित्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- एक वह साहित्य, जिसमें जीवनोपयोगी आदेशों, उपदेशों, निर्देशों या नीतयों आदि की उपस्थिति परोक्षया अप्रत्यक्षरूप में होती है, प्रत्यक्ष रूप में नहीं| विश्व की सभी भाषाओं के काव्य, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, ललित निबंध, संस्मरण-आत्मकथाएँ आदि इसी प्रकार का सहित्य है| यद्यपि संसार की सभी भाषाओं का साहित्य अप्रत्यक्ष रूप से उपरोक्त आदेशों, उपदेशों-निर्देशों अर्थात नीति-नियमों का ही स्पष्टीकरण, व्याख्या या समीक्षा करता है| इसी प्रक्रिया में अनेक प्रकार की नीतियाँ,'बोध वाक्यों' या 'सुभाषितों' या ''कहावतों, के रूप में सर्जित भी हो जाती हैं|इन बोध वाक्यों या सुभाषितों का उद्देश्य रसपूर्ण तथा प्रभावशाली शब्दावली में लोकमंगल का ही विधान करना होताहै|इसमें मानव समाज के अंतर्गत सुसंगत एवं सुमधुर व्यवहार की स्थापना तथा अशुभ, अमंगल एवं अभद्र के विनाश की प्रवृत्ति स्पष्ट पायी जाती है|हमारे राष्ट्र की मुद्रा पर अंकित बोध वाक्य है- "सत्यमेव जयते" | यहाँ यह सूचित कर देना अनुचित न होगा कि‘मुंडकोपनिषद’-तृतीय मुण्डक-प्रथम खंड के छटवें मन्त्र का यह वाक्यांश, इ.पू. 250 वर्ष,सम्राट अशोक ने सारनाथ में अपने‘सिंहस्तंभ’ के शिखर पर खुदवाया था|वह सिंहस्तंभ ही अब हमारा राष्ट्रीय प्रतीक है|पूरा नीति वाक्य इस प्रकार है- "सत्यमेव जयति, नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान:|"अर्थात सत्य की ही विजय होती है असत्य की नहीं, सत्य का पथ ही देवयान बन जाता है| इसी प्रकार महाभारत का यह वाक्य -"अहिंसा परमो धर्म: धर्म हिंसा तथैवच: |"ये ऐसे ही सुभाषित या बोध वाक्य हैं|
हमारे देश के प्राचीन साहित्य में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण कथाएँ, कालिदास-भवभूति जैसे कवियों के काव्य ग्रंथ, पंचतंत्र की कथाएँ, जैन आगमों की कहानियाँ, जातक कथाएँ, हितोपदेश और परंपरागत रूप में प्रचलित लोक कथाएँ आदि समाहित हैं| यह संपूर्ण साहित्य परोक्ष रूप से नीति वचनों में निहित आदेशों, उपदेशों-निर्देशों को ही संप्रेषित करता है| उपरोक्त साहित्यिक ग्रंथों में उपलब्ध असंख्य बोध वाक्य तथा सुभाषित या नीति वाक्य आदि, हजारों वर्षों से हमारी भारतीय सांस्कृतिक एकता को बनाए रखने में तथा हमारे जीवन को संचालित करने में सहायक बने हुए हैं| जैसे- "या विद्या सा विमुक्तये", “विद्या ददाति विनियम्",
"स्वाध्याय न प्रमाद:”, "मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भाव", “परस्पर ग्रहो जीवानाम्”-‘जीओ और जीने दो’, “अप्पा दीपो भव” इत्यादि उपरोक्त साहित्य की ही देन हैं
नीति साहित्य-दूसरे प्रकार का वह साहित्य, जिसके अंतर्गत प्रत्यक्ष रूप से, सीधे-सीधे जीवनोपयोगी आदेश, उपदेश-निर्देश आदि नीति वचनों का समावेश होता है| ये विशुद्ध रूप से नीति-नियमों के‘संकलन’ नीति साहित्य या 'नीति-ग्रन्थ" कहलाते हैं| ये ग्रंथ जब ‘मुक्तक काव्य’ के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं, तब इन्हें “नीतिकाव्य” कहा जाता है|संस्कृत के प्राचीन नीति ग्रंथों में शुक्राचार्य नीति, भीष्मनीति, बृहस्पति निति, परशुरामनीति, गर्गनिति, चार्वाक नीति आदि की मालिका में 'मनुस्मृति', 'विदुर नीति', 'चाणक्य नीति', 'भर्तृहरि निति शतक' आदि बहुत प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं| भले ही मनुस्मृति जैसे गर्न्थों के अनेक नीति वचन आज ‘काल बाह्य’ हो गए हैं और हमारे राष्ट्रीय जीवन में उनकी उपयोगिता समाप्त हो गयी है, फिर भी कुछेक बातें आज भी प्रासंगिक मानी जा सकती हैं,जैसे- मनुस्मृति के दूसरे अध्याय का एक श्लोक कहता है-
"विषादप्यमृतं ग्राह्यं, बालादपि सुभाषितम् | अमित्रादपि सदवृत्तम मेध्यादपि कांचनम||"
(239)
अर्थात् विष में से भी अमृत को, बालक से भी सुन्दर वचनों को, शत्रु से भी अच्छे आचरण को तथा अशुद्ध स्थान पर भी पड़े हुए स्वर्ण को ले लेने में संकोच नहीं करना चाहिए| इसी भाव को हिन्दी के नीतिकार कविवर वृन्द ने यों कहा-
"उत्तम विद्या लीजिये, जौ काउ पै होय| पड्यो अपावन ठौर में कंचन तजत न कोय||"
इसी प्रकार उक्त ग्रन्थ का एक श्लोक, वरिष्ठों एवं बृद्धों के प्रति नम्रता, सेवा तथा सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करने की ओर हमें प्रेरित करता है| कहा गया है-
"अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:| चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशोबलम् ||"
(121)
महाभारत के एक प्रसिद्ध व्यक्ति 'महात्मा विदुर'के नाम पर 'विदुर निति' की अनेक बातें आज भी प्रासंगिक हैं| जैसे -“कर्मणा मनसा वाचायदभीक्ष्णं निषेवते| तदेवापहरत्येनं तस्मात् कल्याणमाचरेत्||” अर्थात मन, वचन और कर्म से जिसकी चाहना की जाती है, वह वस्तु अपनी ओर आकर्षित हो जाती है| इसलिए सदैव कल्याणकारी कार्यों का ही चिंतनकरना चाहिए| (महा.भा. उद्योगपर्व 41वाँ अध्याय-55) ,“नविश्वसेदविश्वस्तेविश्वस्तेनातिविश्वसेत्| विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति||” अर्थात जो मनुष्य विश्वास करने योग्य नहीं है, उस पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिए बल्कि आँख मूँद कर तो किसी पर भी विस्वास न करें|"(महा.भा. उद्योगपर्व32 वाँ अध्याय,9)
संस्कृत के उक्त निति ग्रंथों में सर्वाधिक प्रासंगिक "चाणक्य नीति" को माना जाता है| विशेषत: राजनीति और कूटनीति के क्षेत्र में इस ग्रन्थ की खूब चर्चा होती है|यहाँ इस ग्रन्थ से दो अत्यंत प्रचिलित उदाहरण प्रस्तुत हैं-
"पयपानाम् भुजंगानाम् केवलम् विष वर्द्धनम् | मूर्खाणाय उपदेशेसु प्रकोपाय न शान्तये||" अर्थात जिस तरह सर्प को दूध पिलाने से उसका विषवर्धन ही होगा| उसी तरह मूर्खव्यक्ति को कितना ही समझाएं उसका क्रोध शांत नहीं होता | चाणक्य अपने एक अन्य उपदेश में कहते हैं-
" पुस्तकेषु चया विद्या, पर हस्तेषु चयद्धनम् | उत्पन्नेषु चकार्येषु, न सा विद्या न तद् धनम् ||" अर्थात पुस्तक में रखी हुई विद्या और दूसरे के हाथ में गया हुआ धन, कार्य पड़ने पर काम नहीं आता | इसलिए ही तो कहा जाता है की " विद्या कंठी की, पैइसा अंटी का|"
इस क्रम में भर्तृहरि के प्रसिद्ध "नीति शतक" से भी कुछ लोक प्रचलित उदाहरण देख लेना यहाँ अनुचित नहीं है-"साहित्य संगीत कला विहीन: साक्षात्पशु: पुच्छविषाणहीन:|तृणन्न खादन्नपि जीवमानास्तद्भागधेयं परमं पशुनाम् ||"
(12)
जो मनुष्य साहित्य, संगीत कला आदि का ज्ञान नहीं रखते वे बिना पूंछ और सींग के साक्षात् पशु हैं| इस तरह के पशु जो घास न खा कर जीते हैं, यह पशुओं के लिए परम सौभाग्य की बात है||” एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं-
" येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं गुणो न धर्म: |
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ||"
(13)
अर्थात जिन मनुष्यों के व्यक्तित्व में विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील सौजन्य और धर्म आदि में से कुछ भी नहीं है, वे इस मृत्यु लोक में पृथ्वी के भार स्वरूप हैं और मनुष्य हो कर भी वे पशु की तरह विचरण करते हैं|
हिन्दी में नीति साहित्य-
अब तक हमने संस्कृत में नीति साहित्य का संक्षिप्त उल्लेख किया है| यह सर्व मान्य तथ्य है कि संस्कृत साहित्य ने पाली, प्राकृत, अपभ्रंस और आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य को न्यूनाधिक मात्रा में प्रभावित किया ही है | कुछ विद्वानों की राय में तो हिंदी संस्कृत की सर्वाधिक उत्तराधिकारिणी है| विशेषत: हिन्दी का मध्ययुगीन साहित्य संस्कृत साहित्य से पर्याप्त मात्रा में प्रभावित माना जाता है| नीति काव्य के सन्दर्भ में भी यह कथन सत्य है| साथ ही यह भी तथ्य है कि हमारे इन मध्य युगीन साहित्यकारों ने अपनी आवश्यकताओं के अनुसार पूर्ववर्ती नीति वचनों में कुछ जोड़ा और घटाया भी है| हिन्दी के आदिकालीन और भक्तिकालीन साहित्य में अलग से भले ही कोई उल्लेखनीय नीति ग्रन्थ नहीं पाया जाता हो, किन्तु उस साहित्य में भी, विशेषत: भक्ति साहित्य में निति वचनों के अमूल्य मोती बिखरे पड़े हैं, जो आज भी हिन्दी भाषी जनता के कंठ हार बने हुए हैं| चंदवरदाई, गोरखनाथ, मलिक मुहम्मद जायसी, कबीरदास , तुलसीदास, सूरदास,कुंभनदास जैसे अष्टछाप के कवि, और अब्दुल रहीम खानखाना जैसे अनेक कवियों की रचनाओं में से असंख्य काव्यांश ऐसे हैं, जो आज भी दैनिन्दन जीवन में नीति वचनों की तरह हिंदी भाषी जनता का मार्ग दर्शन करते हैं|इनमें से कबीर, तुलसी, और रहीम की शब्दावली सर्वाधिक मात्रा में प्रयुक्त की जाती है|इन तीन कवियों के नीति वचनों पर प्रकाश डालने से पूर्व, उस काल खंड के अन्य कवियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत करना यहाँ अपेक्षित है| चंदवरदाई का यह वाक्य, " मति चूकौ चौहान"सुअवसर को हाथसे न जाने देने के लिए कहावत की तरह प्राय: सुना जाता है| पूरा दोहा इस प्रकार है- " चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण| ता ऊपर सुलतान है, 'मति चूकौ चौहाण||"
प्राचीन काल से हीभारतीय संस्कृति में गुरु के महत्व का प्रतिपादित किया गया है, गोरख नाथ कहते हैं-
"गुरु कीजै भईला, निगुरा न रहिला | बिनु गुरु ग्यान न होय मेरे भईला||"(भईला=भाई)
हिन्दी के आदिकालीन महाकवि विद्यापति कहते हैं कि ‘प्रेम भाव’ और ‘अहं भाव’ एक साथ नहीं रह सकते-
“तावे जीवण नेह रह, जाव ण लग्गे माण ||” (कीर्तिलता) अर्थात ‘जीवन में स्नेह तभी तक बना रहता है, जब तक उसके बीच ‘मान’ (अभिमान, अहंकार ) नहीं आता|) जब कबीर यों कहते हैं कि “प्रेम गली अति सांकरी, जामें दोय न समाहिं|” तब वे इसी ‘अहंकार’ की ओर ही संकेत कर रहे होते हैं| रहीम भी अपने शब्दों में यही कहते हुए दिखाई देते हैं- “चाखा चाहे प्रेम रस, राखा चाहे मान| कहि रहीम कैसे रहें, दो असि एकहि म्यान||” (असि=तलवार)
जीवन में प्रेम ही सार तत्व है| जायसी का कथन है-"मानुष पेम भयहु बैकुंठी| नाहित छार रयहु दुई मूठी" (प्रेम के कारण ही मनुष्य स्वर्गीय है अन्यथा दो मुट्ठी राख ही तो है|)जीवन में प्रेम की महत्ता के संबंध में कबीर का यह वचन प्राय: सबकी जबान पर चढ़ा होता है- “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भाया न कोय| ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय|” जिस तरह प्रेम में अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं होता, उसी तरह वहाँ ‘छल-कपट’ के लिए भी कोई जगह नहीं होती| कविवर वृन्द का वचन है कि,‘प्रेम के प्रभाव में पानी दूध का मूल्य (महत्ता) प्राप्त करता है, किन्तु कपट रूपी खटाई की एक बूँद भी, पानी को पानी नहीं रह्ने देती और दूध को दूध नहीं| दोनों की सत्ता नष्ट हो जाती है’- “जल पय सरिस बिकाय, देखो प्रीति की रीति भल, बिलग होय रस जाय, कपट खटाई, परत ही||”
कुसंग छोड़ने की सलाह प्राय: सभी नीतिकार देते हैं| सूरदास के एक पद की पंक्तियाँ हैं-
"तजौ मन हरि बिमुखन कौ संग| जिनके संग कुबुधि उपजति है, परत भजन में भंग ||"
प्राय; नीतिवान लोग, किसी सत्ता-संपत्ति वालों की जी हुजूरी करने का निषेद करते हैं, उस संदर्भ में उन्हें 'कुंभनदास' के शब्द याद आते हैं- " संतन कहा सीकरी सौं काम|" ऐसा कह कर कवि फतेहपुर सीकरी में सम्राट अकबर के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया था| पूरा पद इस प्रकार है-
"संतन कहा सीकरी सौं काम|
आवत जात पनहियाँ टूटें, बिसरि जाय हरि नाम|
जिनकौ मुख देखें दुःख उपजत , तिनकों करबे परै सलाम|
'कुंभनदास' लाल गिरधर बिनु, और भये बे काम ||"
हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन कवियों में कबीर, तुलासीदास और रहीम बेजोड़ नीतिकार माने जाते हैं , भले ही उनके नाम पर अलग से कोई नीति ग्रन्थ नहीं है| इनमें कबीर बिना पढ़े-लिखे माने गए हैं, किन्तु उनकी वाणी के संकलन में सामाजिक प्रबोधन की अनेक ऎसी उक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जो सहज,सरल और अनूठी भाषा-शैली में होने के कारण जन सामान्य में अधिक लोक प्रिय हैं| एक दोहे में उन्होंने मूर्ख को न समझाने का एक अछूता उदाहरण प्रस्तुत किया है| वे कहते हैं -
"मूरख को समझायवे, ग्यान गाँठ कौ जाय| कोयला होय न ऊजरौ, चाहे सौ मन साबुन खाय||"
इसी विचार को संत तुलसीदास ने भी अपनी शब्दावली में इस तरह व्यक्त किया है-
"फूलै फरै न बेत, जदपि सुधा बरषहिं जलद| मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम||"
(रा.च. मानस -लंकाकाण्ड सोरठा 16 ख )
(फरै=फले, फल|, बेत=एक पेड़ विशेष जिससे छड़ी या बैंत बनाता है|, जलद=बादल|, बिरंच=ब्रह्मा|)
इन दोनो अभिव्यक्तियों पर चाणक्य नीति के पूर्वोक्त श्लोक- "पयपानम् भुजंगानाम् केवलम् विष वर्धनम् | मूर्खणाहि उपदेशेषु प्रकोपाय न शान्तये|" का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है|
'कर्मफल' के सबंध में लोक प्रचलित नीति वाक्य है, "जैसा करोगे वैसा भरोगे", इसी भाव कोस्पष्ट करते हुए कबीरदास कहते हैं- "करता था सो क्यों किया, अब करि क्यों पछिताय| बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ ते खाय||"यही महाकवि तुलसीदास के शब्दों में, "कर्म प्रधान विश्व करि राखा| जसफल बोबहिं तस फल चाखा||"
(जस=जैसा|, तस=तैसा|)
कभी-कभी जीवन में ऎसी स्थितियां भी उत्पन्न हो जाती हैं, जहाँ मनुष्य का बुद्धि-बल बिलकुल हार जाता है, उसका कोई बस नहीं चलता| अदृष्य का खेल कोई नहीं जानता| ऎसी स्थिति में तुलसी के 'मानस' की शब्दावली लोगों के होठों पर अनायास ही उतर आती हैं-
"होइयै सोई जो राम रचि राखा| को कहि तर्क बढ़ावे साखा||" अथवा-
“सुनहु भारत भावी प्रबल, बिलखि कही मुनिनाथ| हानि लाभ जीवन मरण, जस अपजस बिधि हाथ||”
(मुनिनाथ अर्थात वशिष्ट मुनि |भावी=जो होना होता है, वह हो कर ही रहता है| बिलखि=रोते हुए| जस,अपजस=यश-अपयश| बिधि=ब्रह्मा)
संत कबीर दास ने भी किसी भूमिका में यही गाया था-
“करम गति टारें नाहिं टरी|
मुनि बशिष्ट से पंडित ग्यानी, सोधिकें लगन धरी|
सीता हरण, मरण दसरथ कौ, बन-बन बिपति परी||”
कविवर रहीम भी इसी स्वर में स्वर मिला कर बोल उठते हैं -"रहिमन अपने हाथहू, रहत न अपने हाथ|"अथवा -
“जौ रहीम भावी प्रबल होती अपने हाथ| राम न जाते हिरण संग, सिय न रावण साथ||"
भक्तिकालीन कवियों में तुलसी और रहीम दो ऐसे नीतिकार हैं जिन्होंने व्यक्ति और समाजके अंत:संबंधों की हर स्थिति -सुख-दुःख, हार-जीत, हर्ष-शोक, लाभ-हानि, संपत्ति-विपत्ति, शत्रु-मित्र, संग-कुसंग, प्रेम-वैराग्य, घर-परिवार, राजा-प्रजा, आदि पर हिन्दी भाषी जन-मन का कई शताब्दियों से मार्गदर्शन किया है| यहाँ इस विषय पर अधिक विवेचन करने का अवसर नहीं है|
रीतिकालीन नीति कवि और गिरिधर कविराय-
हिंदी साहित्य के इस काल खंड को शृंगार काल कहा जाता है| इस काल में मुख्य रूप से शृंगारी कवियों का ही बोलवाला रहा है| फिर भी इस काल खंड में कई ऐसे उल्लेखनीय कवि हुए हैं, जिन्होंने लोक नीति को अपनी वाणी का भूषण बनाया है| ऐसे कवियों में नीति कुंडलियों के रचयिता कविवर 'गिरिधर कविराय' के अतिरिक्त, प्रसिद्ध श्रृंगारी कवि बिहारीलाल, बाबा दीनदयाल गिरि, कविवर वृन्द, बैताल बंदीजन आदि की नीतिपरक रचनाएं बहुत बार सुनी-सुनाई जाती हैं| 'बिहारी सतसई' मूलत: शृंगार रस का काव्य का ग्रन्थ माना जाता है, है भी| किन्तु उसमें नीति परक दोहों की भी कमी नहीं है| दुहरी शासन व्यवस्था में प्रजा को किस तरह दुःख उठाने पड़ते हैं, इसका सटीक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बिहारी कहते हैं- "दुसह दुराज प्रजान को, क्यों न बढ़े दुःख द्वन्द| अधिक अंधेरौ जग करें, मिली मावस रवि चाँद||"अर्थात दो राजाओं (दोसरकारों) के बीच में प्रजा को अवश्य ही दुःख भोगना पड़ता है जैसे, सूर्य और चंद्रमा मिल करजब दिन में निकलते हैं, उस दिन की रात ही घनी काली अंधेरी अमास्या होती है| बिहारी के नीति के दोहों में सहज सरल भाषा शैली के साथ-साथ उनकी सूक्ष्म निरीक्षण क्षमता का भी पता चलता है| उनकी यह बात कितनी सटीक है कि समाज में जो आतंकी-अनाचारी होते हैं, लोग उन्हीं की 'जी हुजीरी' में जुट जाते हैं, जैसे ज्योतिष के अनुसार जब बुरे ग्रहों का प्रभाव होता है तभी लोग जप, दान, यज्ञ आदि कर्मकांड द्वारा उन्हें प्रसन्न करने लगते हैं, अच्छे ग्रहों के समय कोई जप-दान नहीं करता | कवि के ही शब्दों में -
" बसै बुराई जासु मन, ताही कौ सनमान| भलौ भलौ कहि छोडिए, खोटे ग्रह जप दान||"
रीतिकालीन नीतिकारों में मेड़ता (जोधपुर) निवासी कविवर 'वृन्द' का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है| इनका संबंध सम्राट औरंगजेब के दरबार से बताया जाता है| नीतिकार के रूप में इनकी ख्याति का कारण, सात सौ दोहों का संकलन "वृन्द सतसई" है| सूक्ति रूप में प्रस्तुत इनके दोहों की भाषा बड़ी सरल, सरस और कलापूर्ण है| लोक प्रियता की दृष्टि से आज भी 'वृन्द सतसई' के दोहे जन जीवन की वाणी में सुने जा सकते हैं| यहाँ इसके कुछ लोकप्रिय नमूने प्रस्तुत हैं-
"करत-करत अभ्यास के ,जड़मति होत सुजान|
रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निसान||"( इसमें में बताया गया है कि, निरंतर कार्य रत रहने या अध्ययन करते रहने से कार्य कुशलता प्राप्त होती है या अध्ययन करत-करते मतिमंद भी सुज्ञानी बन जाते हैं|
"करै बुराई सुख चहै , कैसे पावै कोई|
रोपै बिरवा आक कौ , आम कहाँ ते होई||"(जैसा करोगे वैसा भरोगे)
बुरे लगत सिख के बचन, हिये विचारौ आप|
करूवी भेषज पिये बिन, मिटै न तन की ताप||"(नासमझ लोगों को सदुपदेश अच्छा नहीं लगता| वे यह भूल जाते हैं कि बीमारी दूर करनी है तो कड़बी दबा पीनी पड़ेगी|)
(कविता कौमुदी पहला भाग पृ.394 -397)
आलोच्य काल के नीतिकारों में वृन्द के समकालीन कवियों में "बैताल बंदीजन" के नाम का उल्लेख सभी हिन्दी साहित्यिक इतिहास ग्रंथों में प्राप्त होता है| ये महाशय चरखारीवाले "विक्रमशाह" के दरवारी कवि थे | इनकी रचना "विक्रम सतसई" का उल्लेख तो प्राप्त होता है, किन्तु वह ग्रन्थ अभी तक प्रकाश में नहीं आ पाया है| थोड़े से छंद ही प्राप्त होते हैं| आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सहित तमाम साहित्य-इतिहासकारों ने इनको कुंडलियों का कवि माना है, जबकि उन्होंने जो उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, वे "छप्पय" छंद में हैं| हमें इनका लिखा एक भी कुंडलिया छंद प्राप्त नहीं हो सका| ये छप्पय छंद उन्होंने अपने आश्रयदाता 'विक्रमशाह, को सबोधित किये हैं| - यहाँ एक उदाहरण प्रस्तुत है-
"जीभ जोग अरु भोग , जीभ बहु रोग बढ़ावै |
जीभ करै उद्योग , जीभ लै कैद करावै ||
जीभ स्वर्ग लै जाय, जीभ ही नरक दिखावै|
जीभ मिलावै राम, जीभ सब देह धरावै ||
निज जीभ ओठ एकाग्र करि, बाँट सहारे तोलिये |
बेताल कहै विक्रम सुनो , जीभ संभारे बोलिए|| -कवि ने यहाँ जिव्हा अर्थात 'रसना' और 'वाणी' दोनो पर संयम रखने के महत्व का प्रतिपादन किया है |( कविता कौमुदी पहला भाग पृ.399 )
कुंडलिया छंद और नीतिकार गिरिधर कविराय-
रीतिकालीन कवियों में 'बाबा दीनदयाल गिरि तथा गिरिधर कविराय दो ऐसे नीतिकार कवि हैं, जिन्होंने इसकाल खंड में कुंडलिया छंद को बहुत लोक प्रिय बना दिया| इन दोनों नीतिकारों की कुंडलियों पर कुछ कहने से पहले, यहाँ कुंडलिया छंद की कुछ विशेषताओं का उल्लेख करना उचित समझते हैं|
1-'कुंडलिया'और 'छप्पय' हिन्दी के दो ऐसे मात्रिक छंद हैं, जो दो या दो से अधिक मात्रिक छंदों अर्थात दोहा, रोला, सार, सोरठा, उल्लाल आदि समप्रवाही मित्र छंदों के पूर्ण अथवा अर्ध अनुच्छेदों को मिला कर बनाए जाते हैं|
२- इस प्रकार ये दोनों मिश्र छंद हैं , छंदशास्त्र में इन्हें "प्रगाथ" भी कहा जाता है|
3-'छप्पय'(छह पद) का नाम तो उसके छः चरणया पद होने के कारण पड़ा है| सामान्यत: छप्पय और कुंडलिया को छोड़कर अन्य सभी छंदों के चार चरण होते हैं|
4-चरणों की दृष्टि से कुण्डलिया छंद , दो प्रकार के हैं –एक सम चरणों वाले जैसे -छह, आठ, दस, आदि चरणों के तथा विषम चरणों वाले जैसे- पांच, सात, नौ, आदि चरणों में भी पाए जाने वाले छंद |
5-कुण्डलिया का नाम, इस छंद की "कुंडलित रीति" अर्थात उसकी आवृत्तिमूलक विशेषताओं के कारण पडा है| ये विशेषताएं हैं ,उसकी वक्रता (पुनरावृत्ति) और वर्तुल अर्थात कुंडल (‘आदि अंत’ की साम्यता) बनाना है| छंद शास्त्र में इन्हें "सिंहावलोकन" तथा "आद्यंत साम्य" भी कहते हैं|
6-कुण्डलिया छंद में 'कविनाम छाप' की भी अपनी कलात्मकता है| इस छंद के पांचवें चरण के पूर्वार्ध में कवि नाम छाप,“कह गिरिधर कविराय” या “बरनै दीन दयाल”,या “कह काका कविराय’ आदि,रोला चरण की ग्यारह मात्रा की यति पर समाप्त होती है, जो छंद चरण की यति, गति और लय में पूर्णत: समाहित होकर एक मधुरता का निर्माण करती है |
7-कुंडलिया हिन्दी का अपना एक अत्यंत लचीला छंद है| उसके बीस-इक्कीस प्रकार पाए जाते हैं| “कुण्डलिया रामायण”जैसे ग्रंथ में इसके दर्जनों प्रकार हैं| इसलिए वह एक छंद मात्र न होकर पूरा एक 'छंद समूह' या "छंद परिवार" माना जाता है|
8-अनुमान से इस छंद का प्रचलन ईसा की नौवीं शताब्दी से आज तक तथा बिहार के मिथिला प्रदेश से लेकर गुजरात के कच्छ तक के भू भाग में लोकप्रिय बना हुआ है|
9- हिन्दी का "पल्लवन काव्य" इसी छंद में रचा गया है अर्थात कबीर के दोहों पर 'कबीर कुंडल', तुलसी के दोहों पर "तुलसी सुधाकर', रहीम के दोहों पर 'रहीमन शतक' और बिहारी के दोहों पर "बिहारी बिहार" तथा अंबिकादत्त व्यास के दोहों पर 'कृष्ण रसायन'जैसी अनेक रचनाएँ‘पल्लवन काव्य’ के रूप में पाई जाती हैं| इसमें किसी अन्य कवि के दोहों में, कोई दूसरा कवि अपना रोला छंद मिला कर, उसे कुंडलिया छंद के रूप में परिवर्तित कर देता है|
10-संत कवि अग्रदास 'अग्रअलि', पल्टू साहेब, 'तुलसी साहेब हाथरसी' जैसे अनेक कवियों ने, गेय पदों की तरह 5, 7, 9, 11 आदि विषम चरणों की गेय कुंडलियों का निर्माण किया है|
बाबा 'दीनदयाल गिरि' और 'गिरिधर कविराय' दोनों की कुंडलियाँ, दोहा रोला के मिश्रण से बनी हैं तथा छ:चरणों की हैं और प्राय: इस छंद के सभी नियमों का पालन करतीं हैं|( उपरोक्त मुद्दों की अधिक जानकारी के लिए देखें-“हिन्दी का कुण्डलिया छंद और साहित्य” ले.केशव प्रथमवीर)
बाबा दीनदयाल गिरि 'अन्योक्ति पद्धति' की शैली में रचित नीति विषयक कुंडलियों के लिए प्रसिद्ध हैं| वैसे तो उनके कई ग्रन्थ पाए जाते हैं, किन्तु 247 कुंडलियों में लिखा "अन्योक्ति कल्पद्रुम" नामक ग्रन्थ बहुत सराहा जाता है| इनकी रचनाओं में भावुकता के साथ-साथ चमत्कार प्रियताका गुण भी पाया जाता है|भाषा और भाव दोनों दृष्टियों से वे एक उच्चकोटि कवि सिद्ध होते हैं| यहाँ एक छंद प्रस्तुत है, जिसमें एक बूढ़े शेर की शोचनीय स्थिति के बहाने, एक ऐसे व्यक्ति के हतबल हो जाने की दयनीय दशा का व्यंजनात्मक निर्देश किया गया है, जिसने कभी बड़ा वैभवशाली, बलशाली, प्रभावशाली तथा दवंग व्यक्तित्व पाया हो | वे लिखते हैं -
"टूटे नख रद केहरी, वह बल गयो थकाय|
हाय ज़रा अब आय कें, यह दुःख दियो बढ़ाय ||
यह दुःख दियो बढ़ाय, चहूँ दिसि जंबुक गाजैं|
ससक लोमड़ी आदि, स्वतंत्र करें सब राजैं |
बरनैं दीनदयाल, हिरन बिहरैं सुख लूटें|
पंगु भयो मृगराज, आज नख रद के टूटें||( रद=दांत | कविता कौमुदी पहला भाग पृ.465)
गिरिधर कविराय की नीति परक कुण्डलियाँ-
मध्यकालीन उत्तर भारतीय सामान्य जनता में 'गिरिधर कविराय' नीतिकार कवि के रूप में जितने लोकप्रिय हुए हैं, उनकीबराबरी में महाकवि तुलसी जैसे एक -दो कवि का नाम ही और लिया जा सकता है| कुण्डलिया छंद तो उनके व्यक्तित्व का ही पर्याय है| 'कुण्डलिया' छंद का उच्चारण करते ही, जन-मन में 'गिरिधर कविराय' का नाम उभर आता है और 'गिरिधर कविराय' कहते ही 'कुण्डलिया' छंद का स्मरण हो आता है|इसी लोकप्रियता के कारण, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी इन्हें हिन्दी भाषी जनता के तीन प्रमुख सलाहकारों में से एक मानते हैं| उनका कथन है कि, "वस्तुतः साधारण हिन्दी भाषी जनता के सलाहकार प्रधानत: तीन ही रहे हैं- 'तुलसीदास', 'गिरिधर कविराय', और 'घाघ'|"
जीवन रेखा- तमाम प्राचीन हिन्दी कवियों की तरह गिरिधर कविराय की जीवनी के संबंध में विद्वानों में मत भिन्नता पाई जाती है| डॉ. किशोरीलाल गुप्त द्वारा संपादित ,"गिरिधर कविराय ग्रंथावली" में इन सभी मतमतान्तरों का आकलन किया गया है| यहाँ उसी ग्रंथावली के आधार पर यह कहा जा सकता है कि गिरिधर कविराय का जन्म, अखंड भारत के पंजाब में हुआ और किसी कारण उन्हें वैरग्य हुआ, तो पंजाब छोड़ कर पूर्वी उत्तर प्रदेश में – कानपुर से इलाहाबाद के बीच विचरण करते रहे| उनकी रचनाओं से पता चलता है वे अद्वैतवादी वेदांती मतालान्बी थे| बताया जाता है कि वे वि. सं.1820 (ई.स. 1763 ) तक जीवित थे| वे विवाहित तो थे, किन्तु कोई संतान नहीं थी| उनकी कुछ कुण्डलियाँ 'साईं' शब्द से प्रारंभ होती हैं, जिन्हें कुछ विद्वान् उनकी पत्नी द्वारा रची गयी बताते हैं| किन्तु निश्चित कुछ भी पता नहीं है|
विरक्ति-कथा- गिरिधर कविराय विरक्त क्यों हो गए, इस सन्दर्भ में राम नरेश त्रिपाठी ने एक घटना का उल्लेख किया है, जोइस प्रकार है- "इनके विषय में एक कहावत प्रसिद्ध है कि इनके पड़ौस में एक बाढ़ई आ बसा| उसने एक ऐसा पलंग बनाया जिसके चारों पाओं में पंखे लगे थे| जब कोई उस पलंग पर लेटता तो पंखे अपने आप चलने लगते थे| बाढई ने यह पलंग राजा को दे दिया| राजा ने उससे वैसा ही एक और पलंग बना लाने को कहा| गिरिधर के आँगन में बेर का एक वृक्ष बड़ा सुन्दर था| बाढई की गिरिधर से कुछ खटपट हो गयी थी| इसलिए बाढई ने राजा से वही पेड़ लकड़ी के लिए माँगा| राजा ने आज्ञा दे दी| गिरिधार ने राजा से बहुत प्रार्थना की कि वह पेड़ न दिया जाय| परन्तु राजा ने नहीं सुनी| इससे रुष्ट हो कर गिरिधर उस राज्य को छोड़ कर भ्रमण करने लगे| उसी भ्रमण के समय में स्त्री-पुरुष दोनों ने मिलकर कुंडलियों की रचना की|"(कविता कौमुदी, पहला भाग पृ.426 -7 )
हमारे मत से यह घटना सत्य भी हो सकती है| उनकी एक अन्योक्ति परक कुंडलिया इसी तथ्य की ओर संकेत करती हुई दिखाई देती है-
"रहिए लटपट काटि दिन, बरु घामें मा सोय|
छाँह न वाकी बैठिये ,जो तरु पतरो होय||
जो तरु पतरो होय, एक दिन धोखा दहै|
जा दिन बहै बयारि, टूटि तब जर से जहै |
कह गिरिधर कविराय , छाँह मोटे की गहिए|
पाता सब झरि जाय, तऊ छाहैं मा रहिए|| (43)
शब्दार्थ- लटपट= जैसे-तैसे; किसी तरह से; किसी भी कठिनाई को रहन करते हुए| बरु=भले ही| घामें मा=धूप में |
छाँह = आश्रय, शरण | वाकी=उसकी| तरु= व्यंग्यार्थ -आश्रयदाता| पतरो = दुबला,पतला -संकुचित मन वाला|
बयारि=हवा- कठिन समय | जर=जड़, मूल -पूर्णत: मुकर जाना, बदल जाना| मोटे की =बड़े की ;उदार मन
वाले की| पाता =पत्ते -धन, वैभव | मा=में | इसी भाव की एक और अन्योक्ति परक कुंडलिया कवि की घटना से उत्पन्न नाराजी की ओर संकेत करती हुई दिखाई देती है-
साईँ घोड़े अछत ही, गधहन पायो राज|
कौआ लीजै हाथ में, दूरी कीजिए बाज|
दूरी कीजिए बाज, राज पुनि ऐसौ आयौ|
सिंहकीजिएकैद,स्यार गजराज चढ़ायौ|
कहगिरिधर कविराय, जहां यह बूझि बढ़ाई|
तहाँ न कीजै भोर, साँझ उठि चलिए साईँ|| (59)
(अछतही=रहते हुए| गधहन=गधों ने | बूझि=समझ| )
नीति संबंधी कुंडलियाँ –
‘गिरिधर कविराय’ ने कुंडलियों के अतिरिक्तअन्य छंदों में भी कुछ रचनाएँ की हैं| सौ छंदों में लिखित “प्रत्यक्षकानुभाव शतक” में ‘कवित्त’ (घनाक्षरी ),‘सवैया’ छंदों का ही प्रयोग किया गया है| कुछ कवित्त, दोहा और छप्पय आदि “सप्त-भय-निवारण मंत्र” नाम से भी मिलते हैं| “ नल दमयंती” नाम से भी चार-छः लोक छंद प्राप्त होते हैं|
किन्तु मुख्यत: वे “कुण्डलियाकार” हैं |डा. किशोरी लाल गुप्त द्वारा संपादित ‘गिरिधर कविराय ग्रंथावली’ में,पाँच सौ से अधिक कुंडलियाँ संकलित हैं|इन कुंडलियों में बहुत सारी कुंडलियों की विषय वस्तु तो है- भक्ति, वैराग्य, अध्यात्म, गुरु-शिष्य, मोह-माया का त्याग,संत-फकीर, मन, तृष्णा,अविद्या, विभिन्न संप्रदायों के आचार-विचार, आदि| किन्तु उनकी लोकप्रियता और जन-मन में ख्याति का कारण, सिर्फ नीति विषयक कुंडलियाँ ही हैं|
ये कुंडलियाँ सीधी-सादी, सरल भाषा में तथ्य कथन मात्र लगते हैं| उनमें कल्पना की ऊंची उड़ान या लाक्षणिक-व्यंजनात्मक प्रयोग बहुत कम दिखाई देते हैं | ‘उदाहरण’ और ‘अन्योक्ति’ जैसे अलंकारों को छोड़कर उनकी भाषा में,बहुत अच्छी उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास या श्लेष जैसे अलंकारों का अभाव ही दिखाई देता है| इनमें से कुछ अलंकार चोरी-छिपे अपने आप कहीं आ गए होंगे तो अलग बात है| इसलिए उन्हें ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल’ जैसे कुछ विद्वान‘कोरापद्यकार’ ही मानते हैं-
‘सूक्तिकार’ भी नहीं | किन्तु यही तथ्य उनके लिए गुण बन गया है| इस गुण के कारण ही सीधी-सादी ग्रामीण अनपढ़ जनताको गिरिधर की कुंडलियाँ सहज ही कंठस्त हो जाती रहीं हैं और जीवन व्यवहार में उनका मार्ग दर्शन करती रही हैं|प्रसिद्ध गांधीवादी साहित्यकार श्री वियोगी हरि ने इनकी प्रशस्ति में लिखा-
“धनि गिरिधर कविराय ख्याति जग पूरी पाई|
कुंडलियाँ कहि नीति-धर्म की
बेलीबढ़ाई|
ह्रदय-बेधिनी, सरस, अनोखीकही कहावत|
मानस – मत्त – मतंग – निरंकुश –हेतु महावत||”
(कवि-कीर्तन-118)
नीति कुंडलियों की विषय वस्तु-
गिरिधर कविराय की कुंडलियों में प्राप्त नीतियों को मोटे तौर पर व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक आदि भागों में विभाजित किया जा सकता है|
व्यक्तिगत नीति के अंतर्गत- कविराय की उन कुंडलियों को समाहित किया जा सकता है, जिनमें कवि, चिंता, निराशा, स्वाभिमान, अभिमान, चुगली, पश्चाताप, कुमति-सुमति, आदि के संबंध में सभी व्यक्तियों को सचेत करते हुए दिखाई देते हैं| जैसे उनकी ‘चिन्तावाली कुण्डलिया’ अति जन प्रिय कुंडलियों में से एक है|
*- लिखा गया है कि शरीर रूपी वन में चिंता रूपी दावाग्नि, जब अन्दर ही अन्दर धधकती है, तो उसका धुआँ दिखाई नहीं देता| वह कांच की भट्टी की तरह, शरीर के सारे रक्त-मॉस को जला कर ख़ाक कर देती है, सिर्फ हड्डियों की ठठरी मात्र रह जाती है| कवि कहता है, हे मित्रो! ऐसा व्यक्ति कैसे ज़िंदा रह सकता है|
“चिंता-ज्वाल, सरीर बन, दावा लगि-लगि जाय|
प्रगट धुवाँ नहिं देखियत, उर अंतर धुंधुवाय|
उर अंतर धुंधुवाय , जरै ज्यों कांच की भट्टी|
जरिगो लोहू मांस, रहि गई हाड़ की ठट्टी |
कह गिरिधर कविराय, सुनो हो मेरे मिंता|
वे नर कैसे जियें, जाहि तन व्यापे चिंता||” (11)
(दावा= दावाग्नि, दावानल| )
यह एक ऎसी अनोखी कुण्डलिया है जिसमें रूपक और उपमा अलंकार भी प्रयुक्त हैं| ‘चिंता’पर और भी अनेक लोक प्रचलित वाक्य देखी-
“चिंता तुराणाम् सुखंन निद्रा|” अथवा “चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत||”या“चिंतासांपिन को नहीं खाया|”
*-कवि के मतानुसार‘विवेकी व्यक्ति’वही है जो तन और धन की अपेक्षा मन को स्वस्थ रखने में अपनी भलाई समझता है|, क्योंकि-
“तन दुरुस्त से होत है,विषय जन्य सुख भोग|
धन दुरुस्त से फिरत हैं, आगे पीछे लोग|
आगे पीछे लोग, जो मन की होय दुरुस्ती|
भोगै ब्रह्मानंद
, अविद्या करै न सुस्ती |
कह गिरिधर कविराय, विवेकी जो हैं हरजन|
मन को करै दुरुस्त, दुरुस्त न चाहै तन धन||(250)
सभी युगों के समाज में किसी से सहानुभूति रखने वाले व्यक्ति कम ही होते हैं, खिल्ली उड़ाने वाले ही अधिक पाए जाते हैं| इसलिए कविराय की दृष्टि में व्यक्ति को चाहिए कि अपने मन की योजनाओं को उजागर नकरे| जब कार्य सफल हो जाएगा तब अपने आप ही लोगों को पता चल जाएगा| सुनें-
साईँ अपने चित्त की, भूलि न कहिए कोय|
तब लग मन में राखिए, जब लग कारज होय|
जब लग कारज होय, भूलि कबहू न कहिए|
दुर्जन हँसे न कोय , आप सियारे व्है रहिए|
कह गिरिधर कविराय, बात चतुरान की ताईं|
करतूती कहि देत , आप कहिए नहिं साईँ|| (72)
*-यह बिलकुल यथार्थ बात है कि समाज में उसी व्यक्ति का मान-सम्मान होता है जो किसी प्रकार की सामर्थ्य रखता हो| कवि का परामर्श यह कि इतनी समझ तो होनी ही चाहिए कि जहाँ कुछ प्राप्त करने को ही नहीं है, वहाँ शाम तक ठहरने से कोई लाभ नहीं है | वहाँ से तो सबेरे से ही उठ कर चला जाना चाहिए| उन्होंने निर्जल सरोवर तथा हंस का, बिना फलवाले वृक्ष और पक्षियों का, अविकसित कमल तथा भ्रमर आदि का उदाहरण देते हुए समझाया है कि -
साईँ हंस न आवहिं, बिन जल सरवर पास|
निरफल तरवर ते रहें, पंछी पथिक उदास|
पंछी पथिक उदास, छाँह विश्राम न पावैं |
जहाँ न प्रफुल्लित कमल,भ्रमर तहँ भूलि न आवैं|
कह गिरिधर कविराय, जहाँ यह बूझि बड़ाई |
तहाँ न करिए साँझ , प्रात ही चलिए साईँ|| (79)
पारिवारिक विषय-
*- व्यक्ति का व्यक्तित्व समाज में विकसित होता |समाज की सबसे छोटी और महत्वपूर्ण इकाई ‘परिवार’ है | परिवार में मधुरता बनी रहनी चाहिए| इसके लिए गिरधर कविराय की सलाह है कि घर के मुखिया को चाहिए कि वह अपने भाइयों को नाराज न करे| भाइयों की फूट परिवार का सर्व नाश का कारण बन जाती है| उन्होंने अपनी अनेक कुंडलियों में पारिवारिक कलह का निषेद करते हुए रावण की लंका के विनाश का उदाहरण देते हुए समझाया; उन्हीं के शब्दों में –
“फूटै घर को यूं भयो, जानत सकल जहान|
मंदोवरि ईजत गई, गयो रांवन को प्रान|
गयो रांवन को प्रान, भेद बभीछन दीनो |
सकल कुटंब परिवार, नास अपनो ही कीनो |
कह गिरिधर कविराय, कोट लंका किम तूटै |
मिले दुसमणा जाय, बंध जब घर को फूटै ||”( 515)
(शब्दार्थ- मंदोवरि =मंदोदरी|, बभीछन=विभीषण|, कोट=गढ़- किला| दुसमणा= दुश्मन| बंध=बंधु, भाई|)
*- इसी तरह कुंडलिया क्रमांक 73 में उन्होंने इसी उदहारण का सहारा लेते हुए कहा है कि –
‘साईँ अपने भ्रात को, कबहुँ न दीजै त्रास|
पलक दूरि नहिं कीजिए, सदा राखिए पास|
सदा राखिए पास, त्रास कबहूँ नहिं दीजै|
त्रास दियो लंकेस, ताहि की गति सुनि लीजै|
कह गिरिधर कविराय ,
राम सों मिलिगो जाई|
पाय विभीषण राज , लंकपति बाज्यो साईँ||” (73)
(बाज्यो =प्रसिद्ध हुआ )
*- एक अन्य कुण्डलिया में कविराय कहते हैं किजिस तरह लकड़ी के रूप में, वृक्ष का ही एक भाग जब कुल्हाड़ी का हत्ता (बैंट) बन जाता है,तब
वह कुल्हाड़ी ही वृक्ष को,तुकडे-तुकडेकर काट
देती है|ठीक इसी तरह घर की फूट भी परिवार को छिन्न-भिन्न करदेती है| हिरणकश्यप,कंश, बलि और रावण के परिवारों का विनाश इसी घर की फूट के कारण हुआ|
(देखें छंद क्र. 66 )
*- इसी तरह कवि की दृष्टि में वह पुत्र भी कुपुत्र है जो अपनी पत्नी की बातों में आ कर अलग हो जाने के लिए पिता से झगड़ा करता है|उक्त गिरधर ग्रंथावली के छंद क्र.
3, 4 तथा 6
में ऐसे ही कुपुत्रों को कोसते हुए लिखे गए हैं - यथा,
“बेटा बिगरो बाप सों, करि तिरियन को नेहु|
लटापटी होने लगी , मोहि जुदा करि देहु|
मोहि जुदा करि दहु, घरी मा माया मेरी|
लैहौं घर अरु बार, करों मैं फजियत तेरी|
कह गिरिधर कविराय, सुनो गदहा के लेटा|
समय पर्यो है आय, बाप से झगरत बेटा||” (4)
(शब्दार्थ- लटापटी = खटपट; कहासुनी; वाद-विवाद| घरी मा= घर में की| लैहों=ले लूगा| अरु=और| बार= द्वार|)
सामाजिक विषय--
*- सामाजिकता एक विस्तृत संकल्पना है, जिसमें मनुष्य के जीवन की असंख्य गतिविधियाँ समाहित की जा सकतीं हैं| व्यक्ति, परिवार, जाति, व्यवसाय, धर्म-कर्म,आदर्श , भाग्य-सौभाग्य, संगति-कुसंगति ,संस्कृति-विकृति , नियति-पुरुषार्थ आदि सब कुछ इसी में समाहित किया जा सकता है| गिरधर कविराय की कुडलियों में भी अनेक ऐसे विषयों पर कवि की नीति-रीति संबंधी विचार व्यक्त हुए हैं| एक छंद में वे तेरह प्रकार के व्यक्तियों से वैर न करने की सलाह देते हैं| पूरी सूची छंद में इस प्रकार है-
“साईँ बैर न कीजिए, गुरु पंडित कवि यार|
बेटा बनिता पौरिया, यज्ञ करावानहार|
यज्ञ करावन हार ,राज मंत्री जो होई|
विप्र परोसी वैद, आपको तपै रसोई|
कह गिरिधर कविराय, जुगन ते यह चली आई|
इन तेरह सों तरह दिए, बनि आवै साईँ||” (16 )
(शब्दार्थ- पौरिया=द्वारपाल| तरह देना=किसी सुनी सुनाई बात पर ध्यान न देना, नजरअंदाज कर देना| )
*-ऊपर की कुंडलिया में जिस तरह 13 प्रकार के लोगों से वैर न करने की सलाह दी गयी है ,
उसी तरह कुण्डलिया क्र. 17, 23, तथा 24 में, कुछ विशेष प्रकार के लोगों को अविश्वसनीयता की सूची में गिनाया गया है| उनमें से उदाहरण स्वरूप एक कुण्डलिया प्रस्तुत है-
“बैरी, बंधुवा, बानियाँ, ज्वारी, चोर, लबार|
पटवारी, रोगी ऋणी, नगरनारि को यार|
नगरनारि को यार, भूलि परतीति न कीजै|
सौ सौगंधें खाय, चित्त में एक न दीजै|
कह गिरिधर कविराय, घरै आवै अनगैरी |
मुँह से कहै बनाय, चित्त में पूरो बैरी||” (17)
( शब्दार्थ- बंधुवा= बंधुआ मजदूर; कर्ज की ब्याज के बदले में बंधक बनाया गया मजदूर| ज्वारी= जुआ खेलने वाला|
लबार= झूठा | नगरनारि=वेश्या| परतीति=विशवास| अनगैरी= अन्य; अपरिचित, अनजाना| )
*- ‘अतिथिदेवोभव’, प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता रहा है| मध्यकालीन ग्रामीण समाज में यात्रियों के रहने –ठहरने की कोई व्यवस्था तो होती नहीं थी| लोग पैदल यात्रा किया करते थे| अत: ऐसे यात्रियों को ससम्मान विश्राम करने की व्यवस्था करने को लोग अपना सौभाग्य मानते थे| कविराय समाज की इसी रीति-नीति का समर्थन करते हुए कहते हैं-
“साईं समय न चूकिए ,
यथा शक्ति सम्मान|
को जाने को आय है, तेरी पौरि प्रमान|
तेरी पौरि प्रमान, समय असमय तकि आवै|
ताको तू मन खोलि, अंक भरि ह्रदय लगावै|
कह गिरिधर कविराय, सबै यामें सधि आई|
शीतल जल फल फूल, समय जनि चूको भाई|| (76)
शब्दार्थ- को=कौन,| पौरि प्रमान= दरवाजे तक| ताको=उसे ; उसको| समय-असमय= पता नहीं किस आपत्ति-विपत्ति में| ऐसे समय ही किसी अतिथि का मन पूर्वक सम्मान करना ही मानवीय जीवन की साधना है|
*-जीवन में धन-दौलत का महत्त्व सर्व विदित है| किन्तु यह भी तथ्य है कि उसका अभिमान करना मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है| कवि सावधान करते हुए कहता है-
“दौलत पाय न कीजिए, सपने में अभिमान|
चंचल जल दिन चारि को, ठाऊँ न रहत निदान|
ठाऊँ न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै|
मीठे वचन सुने, विनय सभी सबही सों कीजै|
कह गिरिधर कविराय, अरे यह सब घट तौलत|
पाहुन निसि दिन चारि, रहत सबही के दौलत|| (26)
(शब्दार्थ- ठाऊँ =जगह , स्थान| निदान= अंतत: |घट=घडा, ह्रदय| तौलत = जांच करती है|) लोक कहावत है-“धनजोबनको गरब न करिए ,सिमट जाई क्षण में|” रहीम दोहा भी दृष्टव्यहै-
“कमला थिर न रहीम कहि, यह जानत सब कोय| पुरुष पुरातन की बधू , क्यों न चंचला होय||”
•
उक्त कुंडलिया में संकेत किया गया है कि सम्पत्ति चंचला होती है , वह सदैव किसी के पास नहीं रह सकती| इस लिए समझदारी इसी में है कि नाव में बढ़े हुए पानी की उसे परहित में बाहर करते रहना चाहिए ‘कविराय’ कहते हैं-
“पानी बाढ़ो नाव में, घर में बाढ़ो दाम|
दोनों हाथ उलीचिए , यही सयानो काम|
यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै|
पर-स्वारथ के काज,सीस आगे धरि दीजै|
कह गिरिधर कविराय ,
बड़े की याही बानी|
चलिए चाल सुचाल, राखिए अपनो पानी||” (89)
भारतीय संस्कृति में परोपकार ही सबसे बड़ा धर्म माना जाता है, यथा-
“अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वियं| परोपकाराय पुण्याय, पापाय पर पीड़नं||”
इसी भाव को महाकवि तुलसी दास ने सरल शब्दों में कहा है-
“परहित सरिस धर्म नहिं भाई| पर पीड़ा सम नहिं अघमाई|” संस्कृत-हिन्दी में परोपकार के संबंध में बहुत सारी सूक्तियांहै, यथा-“परोपकाराय फलन्ति वृक्ष:,परोपकाराय वहन्ति नद्य: परोपकाराय दुहन्ति गाव:, परोपकारार्थमिदं शरीर||”अथवा- “आत्मार्थजीवलोकेsस्मिन को न जीवति मानव:| परं परोपकारार्थयो जीवति स जीवति|” अर्थात इस जीवलोक में अपने लिए कौन नहीं जीता? परन्तु जो परोपकार के लिए जीता है,उसी का सच्चा जीना है|अथवा-“परोपकाराय सतांविभूतय:” (सज्जनों का वैभव परोपकार के लिए ही समर्पित होता है|) इन्हीं संस्कृतके वचनों को रहीम अपनी वाणी में इस तरह कहते हैं-
“तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पीयहिं न पान| कहि रहीम परकाज हित, संपति संचहिं सुजान||” प्राय: सभी मध्यकालीन हिन्दी कवियों ने अपने-अपने शब्दों में परोपकार का समर्थन किया है|
‘राखिए अपनो पानी|” यह वाक्यांश रहीम के निम्नांकित प्रसिद्ध दोहे का स्मरण कराता है-
“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून| पानी गए न ऊबरे मोती मानसचून||”
*- सर्वत्र गुणों को ही महत्त्व दिया जाता है| कवि भी इसी का अनुमोदन करते हैं -
“गुण के गाहक सहस नर, बिनु गुण लहै कोय|
जैसे कागा कोकिला, शब्द सुनै सब कोय|
शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन|
दोऊ को रंग एक , काग सब भये अपावन|
कह गिरिधर कविराय, सुनो हो ठाकुर मन के|
बिनु गुण लहै न कोय, सहस नर गाहक गुण के|” (27)
वृंद कवि का दोहा देखें-
“ऊंचे बैठे ना लहैं, गुण बिन बड़पन कोय| बैठो देवल सिखर पर,बायस गरुड़ न होय||”
रहीम की व्यंजनात्मक वाणी-“गुण ते लेत रहीम सब,सलिलकूप ते काढ़ि| कूपहुतें कहूँ होत है, मन काहू कौ बाढ़ि|”
*- हम सभी जानते हैं कि सामान्यत: लोग मतलब का रिश्ता रखते हैं| इस तथ्य के संबंध में एक कुण्डलिया बहुप्रचलित है- साईँ या संसार में , मतलब का व्यवहार|
जब लगि पैसा गाँठ में, तब लगि ताको यार|
तब लगि ताको यार, यार संग ही संग डोलैं|
पैसा रहा न पास, यार मुख सों नहिं बोलें |
कह गिरिधर कविराय, जगत यहि लेखा भाई|
बिनु बेगरजी प्रीति, यार बिरला कोई साईँ||” (36)
(शब्दार्थ- बिनु=बिना| बेगरजी= स्वार्थ, मतलब| ताको= उसको| तब लगी= तब तक| लेखा=रीति-नीति|)
रहीम कहते हैं-“कहि रहीम संपति सगे, बनत-बनत बहु रीत| बिपति कसौटी जे कसे, तेही सांचे मीत||”
*- जो लोग सोच-समझ कर कार्य नहीं करते, उन्हें अंत में पछताने के सिवाय कुछ नहीं मिलता| इस विचार के लिए गिरधर कविराय की निम्नांकित कुण्डलिया बहुत ही लोकप्रिय है| वे कहते हैं -
बिना विचारे जो करे, सो पीछे पछताय|
काम बिगारै आपनो, जग में होत हँसाय|
जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावै |
खान पान सनमान, राग-रंग मनहि न भावै|
कह गिरधर कविराय, दुःख कछु तरत न टारे|
खटकत है जिय मांहि, कियो जो बिना विचारे||” (२०)
(शब्दार्थ- खटकत है =चुभता है, दुखता है| जिय माहिं= जी में , मन में
|) भर्तृहरि के नीतिशतक के100 वे श्लोक का स्पष्ट प्रभाव है, जिसका भाव है-“ विद्वान को उचित है कि भला या बुरा कर्म करने से पहले ही उसके परिणाम को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए| बिना विचारे जल्दबाजी में किए गए कर्म का फल मृत्युपर्यन्त ह्रदय को जलाने वाला और कांटे की तरह चुभता रहता है|”
*-लेकिन किसी गलती पर जीवन भर पश्चाताप करते हुए बैठे रहने से भी तो काम नहीं चलता| गिरधर कविराय की नेक सलाह यह है कि जो ‘बीत गई सो बात गई’, उसे भूल जाने में ही समझदारी है और आगे भूल न करने के लिए ही सचेत रहना चाहिए| उनका कथन है-
“बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेय |
जो बनि आवै सहज में, ताही में चित देय|
ताही में चित देय, बात जोई बनि आवै|
दुर्जन हँसे न कोइ , चित्त में खता न आवै|
कहि गिरिधर कविराय, यहै करू मन परतीती|
आगे को सुख समुझि, होइ बीती सो बीती||” (71)
कविवर बच्चन जी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं-
“बीत गई सो बात गई| अंबर के तारों को देखो| कितने उसके तारे टूटे, कितने उसके प्यारे छूटे|
छूट गए फिर कहाँ मिले? पर अंबर कब शोक मनाता है| बीत गई सो बात गई|”
*-अभी ऎसी और भी ढेर सारी नीति कुण्डलियाँ हैं जिनका उल्लेख करना आवश्यक लगता है| किन्तु इस आलेख की अपनी सीमाएँ हैं| फिर भी यहाँ यह सूचित करना आवश्यक लगता है कि कविरायने अपने नीति-निर्देशों के लिए बहुत बार “अन्योक्तियों” को माध्यम बनाया है| कवि ने गाधा, घोड़ा, हिरन, जैसे चौपाए, कौआ, हंस, टिटही, बगुला, सूआ, जैसे पक्षी, दादुर,केंचुआ, सांप-सांपिन,भंवरा, जैसे अन्य प्राणियोंतथामहुआ, रेंड, पलास जैसे वृक्षों का मानवीकरण करते हुए प्रतीकात्मक रूप में मनुष्यों के चरित्रों का चित्रणकिया है| यहाँ एक उदाहरण प्रस्तुत है, जिसमें हंसोंसे स्पर्धा करते हुए कौआसमुद्रके ऊपर उडान भरता है| कौआ मनुष्य की क्षुद्र मनोवृत्ति और हंसउदार, क्षमा शील एवं सामर्थवान मानव के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं-
कौआ मात्यौ ज्वारकौ, मारतफिरत बहंग|
हँसान की सरवर करे,उड़न चाहत होसंग|
उड़न चाहत हो संग, जाय समुदर मंझार्यो|
जल की परी न थाह, बीच में कौआ हार्यो |
कह गिरिधर कविराय, बड़ेन के बड़े पखउआ
दे पंजन के बीच , पारपै डारयो कौआ|| (लोक परंपरा से )
( मात्योज्वार को=खेतों से ज्वार चुग-चुग करमस्तीआ गया | मारत फिरत बिहंग= 1- पक्षियोंको मारता-फिरता| 2-विहंग मारना =डींग हांकना, शेखी मारना,| सरवर=समानता| मंझार्यो=मजधार में |
पखउआ=पंख;सामर्थ्य| पंजन=पंजों में , ऊंगलियोंमें)
फिर भी, यदि कवि की सर्वाधिक लोकप्रिय और बहुप्रचलित कुंडलिया-“लाठी”का उल्लेख न कियातो अनुचित होगा| कवि की दृष्टि में लाठी एक बहु उपयोगी और सर्व सुलभ हथियार है| आजके‘इलाक्त्रोनिकयुग में भी,गरीब देहातियों का सबसे कारगर हथियार‘लाठी’ ही है| कविराय के शब्दों में –
“लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिए संग|
गहिरा नदि नारा जहाँ, तहाँ बचावै अंग |
तहाँ बचावै अंग , झपटि कुत्ता कहँ मारै|
दुश्मन दावागीर, तुरत ताउको झारै|
कह गिरिधर कविराय, सुनो हो धूर के बाटी|
सब हथियारन छांड़ि, हाथ महँ लीजै लाठी|| (67)
(शब्दार्थ- धूर के बाटी = धूल भारी –कच्ची पगडंडी पर चलने वाले|)
नोट –सभी उधृत कुंडलियों की क्रम संख्या “गिरधर कविराय ग्रंथावली” सं. किशोरी लाल गुप्त के अनुसार दी गयी हैं|
*-
निष्कर्ष-
इसी तरह गिरिधर कविराय ने और भी अनेक तात्कालीन उपयोगी नीति-नियमों के विषयों पर कुंडलियों का निर्माण किया है| जैसे कृतज्ञता, कृतघ्नता, मर्यादापालन, स्वाभिमान, चुगलखोरी, दुष्टता, साधुता, सामर्थ्य का महत्त्व, नींची सोच के चरित्रों का उथलापन इत्यादि| उपरोक्त कुंडलियों के परिप्रेक्ष्य में इतना ही कहा जा सकता कि हिन्दी के रीतिकालीन कवियों में से, हिन्दी भाषी ग्रामीण अनपढ़ किसान-मजदूर जनता के बीच जितनी लोकप्रियता “गिरधर कविराय” ने प्राप्त की है, उतनी बिहारी जैसे श्रेष्ठ कवि को भी नसीब नहीं हुई|भले ही ‘कविराय को उनकी जैसी अभिजात्य भाषा-शैली, सामासिक सटीक शब्द लाघव तथा अलंकारिक, सौन्दर्य पूर्ण प्रस्तुतीकरण नशीब नहीं हुआ| वे उस किसान, मजदूर, अनपढ़, गरीब जनता के मार्ग दर्शक थे,जिसको संकेत कर, कविवर “बिहारीलाल” ने व्यंग्य किया था –
“हे गंधी मति मंद तू इतर दिखावत काहि” और उसी जनता ने ‘कविराय’ को
ह्रदय से सम्मान दिया | आज भले ही हमारे देहाती जीवन को आधुनिक तीव्रगामी तकनीकी के प्रभाव ने बहुत कुछ परिवर्तित कर दिया है| और कविराय की अनेक बातें काल बाह्य जैसी लगती हैं| फिर भी जहाँ अभी तक, यह आधुनिक तथाकथित अंग्रेजी शिक्षा नहीं पहुँच पाई है, वहाँ के देहातों में कविराय बाकायदा उपस्थित मिलेंगे| गिरिधर कविराय ने अपनी कुछ नीतियों के लिए पौराणिक उदाहरणों का सहारा लिया है| तत्कालीन ऐतिहासिक घटनाओं की चर्चा वहां दिखाई नहीं देती है| कहीं-कहीं उनकी भाषा में “ गधा के लेटा”, “चूतिया” जैसा भदेसपन भी दिखाई देता है| लेकिन आज भी कुछ लोगों की जबान पर गिरिधर कविराय ससम्मान विराजमान दिखाई देते हैं| वे बात-बात पर इन कुंडलियों के पहले चरण को ‘लोकोक्ति’ या ‘कहावत’ के रूप में प्रयुक्त करते हैं, जैसे- “जीबो मरिबो भोगिबो, यह नहिं अपने हाथ|”, “चिंता ज्वाल सरीर बन ,डाह लगे न बुझाय|”, “दौलत पाय न कीजिए, सपने मेंअभिमान”,
चुगल न चुके कबहुँ को, अरु चुके सब कोय|”, साईँ तहाँ न जाइए, जहाँन आदर होय|”, साईँ या संसार में, मतलब को व्यवहार|”, “राजा के दरबार में, जैये समयों पाय|”, “ बीती ताहि बिसारी दे, आगे की सुधि लेय|”,“बिना बिचार जो करे,सो पाछे पछिताय|” , “ साईँ घोडेन के अछत,गधहन पायौ राज|”, ‘छाँह न वाकी बैठिये, जो तरु पतरौ होय|” और भी ऎसी असंख्य कहावतें हैं, जो हिन्दी भाषी देहात के अंतर्गत सहज ही प्रचालन में मिल जायेंगी| औरबहुतों को तो पता भी नहीं होता कि ये कहावतें सुनाम धन्य‘ गिरिधर कविराय’ की देंन हैं|
संदर्भ ग्रंथ-
1-मनुस्मृति
2-विदुर निति
3-चाणक्य नीति
4-भर्तृहरि शतकत्रयम् –सं एवं टीकाकार-पं. राजाराम पाठक
5-कविता कौमुदी-पहला भाग-सं. राम नरेश त्रिपाठी
6- गिरधर कविराय ग्रंथावली - सं. डा. किशोरी लाल गुप्त
7-हिन्दी का कुण्डलिया छंद और साहित्य - ले. केशव प्रथमवीर
बी- २, दर्शाना पार्क, कल्याणी नगर
मोबाइल- 09923594998
ईमेल- keshav.prathamvir@gmail.com
~केशव प्रथमवीर
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